गणेश चतुर्थी २०२६: गणेश पूजा मुहूर्त, स्थापना समय और चन्द्र-दर्शन परंपरा

By Govind

गणेश चतुर्थी २०२६: गणेश पूजा मुहूर्त, स्थापना समय और चन्द्र-दर्शन परंपरा

गणेश चतुर्थी २०२६ सोमवार, १४ सितंबर २०२६ को मनाई जाएगी। प्रचलित परंपरा में यह भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी का पर्व है और अनेक घरों तथा सार्वजनिक मंडलों में इसी दिन श्रीगणेश की स्थापना, मध्याह्न पूजा और उत्सव का आरंभ होता है।

महत्वपूर्ण: पूजा-मुहूर्त नगर, स्थानीय सूर्योदय-सूर्यास्त और पंचांग-गणना के अनुसार बदलता है। नीचे दिए गए समय केवल संबंधित नगर के लिए हैं; इन्हें पूरे भारत या विदेश के लिए समान न मानें।

२०२६ में गणेश चतुर्थी कब है?

तिथि: सोमवार, १४ सितंबर २०२६

पर्व: श्री गणपति (विनायक) चतुर्थी / गणेश जन्मोत्सव

धर्मशास्त्रीय निर्णय-परंपरा में गणेश चतुर्थी का पर्व-निर्णय भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी की मध्याह्न-व्याप्ति से संबद्ध माना जाता है। अलग-अलग पंचांगों और संप्रदायों में विस्तृत निर्णय-पद्धति की व्याख्या में अंतर हो सकता है। अतः अपने परिवार, गुरु, पुरोहित या स्थानीय पंचांग की परंपरा का सम्मान करना उचित है।

गणेश पूजा मुहूर्त २०२६

नई दिल्ली: मध्याह्न गणेश-पूजा मुहूर्त

लगभग ११:०२ पूर्वाह्न से १:३०/१:३१ अपराह्न तक

यह समय नई दिल्ली को संदर्भ-नगर मानकर दिया गया है। विभिन्न पंचांगों में एक मिनट का अंतर गणना-पद्धति अथवा समय को गोल करने के कारण हो सकता है।

मुंबई: मध्याह्न गणेश-पूजा मुहूर्त

लगभग ११:२० पूर्वाह्न से १:४८ अपराह्न तक

मुंबई का समय नई दिल्ली से अलग है। यही कारण है कि किसी अन्य शहर के लिए प्रकाशित मुहूर्त को बिना स्थानीय जांच के अपनाना उचित नहीं है।

अन्य नगरों के लिए क्या करें?

पुणे, अहमदाबाद, जयपुर, लखनऊ, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलुरु, हैदराबाद या विदेश में रहने वाले श्रद्धालु अपने नगर के विश्वसनीय पंचांग में स्थानीय मध्याह्न गणेश-पूजा मुहूर्त देखें। समय-क्षेत्र, भौगोलिक स्थिति और सूर्योदय-सूर्यास्त में अंतर के कारण एक ही तिथि पर पूजा-अवधि बदल सकती है।

तिथि और मुहूर्त को कैसे समझें?

पंचांग में चतुर्थी तिथि का आरंभ और समाप्ति घड़ी के अनुसार होती है, जबकि गणेश पूजा के लिए सामान्यतः मध्याह्न-काल का विशेष महत्व माना जाता है। इसलिए केवल तिथि आरंभ होने का समय देखकर पूजा का निर्णय नहीं किया जाता।

गृहस्थ-पूजा में उपलब्ध मध्याह्न मुहूर्त में श्रद्धा और सुविधा के अनुसार पूजा की जा सकती है। यदि किसी कारण उस अवधि में विस्तृत पूजा संभव न हो, तो अपने कुलाचार या स्थानीय आचार्य की सलाह के अनुसार संक्षिप्त पूजा करें।

गणेश पूजा मुहूर्त का पुराना Hindupath संदर्भ चित्र

गणेश स्थापना के लिए संक्षिप्त व्यावहारिक मार्गदर्शन

  • घर और पूजा-स्थान को स्वच्छ करके एक स्थिर, साफ चौकी या वेदी तैयार करें।
  • श्रीगणेश की प्रतिमा या चित्र को सम्मानपूर्वक स्थापित करें। मिट्टी की पर्यावरण-अनुकूल प्रतिमा का चयन एक उपयोगी विकल्प है।
  • संकल्प के बाद आवाहन, आसन, जल, पुष्प, अक्षत, दूर्वा, नैवेद्य और आरती अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार अर्पित करें।
  • मोदक, लड्डू, फल या घर में बना सात्त्विक नैवेद्य अर्पित किया जा सकता है।
  • दूर्वा अर्पण की परंपरा व्यापक है; इसके धार्मिक और लोक-प्रचलित संदर्भों के लिए श्रीगणेश को दूर्वा क्यों अर्पित की जाती है? पढ़ें।
  • लाभ, अमृत चौघड़िया या राहुकाल को कुछ परिवार ध्यान में रखते हैं, पर इन्हें गणेश-स्थापना की सार्वभौमिक शास्त्रीय अनिवार्यता नहीं माना जाना चाहिए। मध्याह्न पूजा और अपने कुलाचार को प्राथमिकता दें।

विस्तृत पूजन-क्रम, संकल्प, आवाहन और पुष्पांजलि के लिए श्री गणेश पूजा विधि: संकल्प, आवाहन और पुष्पांजलि तथा घर पर सरल पूजा के लिए गणपति पूजन की सरल विधि देखें।

चन्द्र-दर्शन के बारे में परंपरागत मान्यता

गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्र-दर्शन से संबंधित सावधानी अनेक व्रत-कथा और धर्मशास्त्रीय परंपराओं में मिलती है। परंपरानुसार इसे मिथ्या-अपवाद अथवा अनुचित आरोप से जोड़ा जाता है। यह एक धार्मिक मान्यता है; इसे निश्चित लौकिक हानि या वैज्ञानिक कारण-परिणाम के दावे के रूप में नहीं समझना चाहिए।

कुछ परिवार स्थानीय पंचांग में दिए गए चन्द्र-दर्शन-वर्जन काल का पालन करते हैं, जबकि अन्य अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार आचरण करते हैं। इस विषय की कथा और परंपरागत संदर्भ के लिए गणेश चतुर्थी पर चन्द्र-दर्शन की परंपरागत मान्यता देखें।

कथा: चन्द्रमा, मिथ्या-अपवाद और स्यमन्तक-मणि

गणेश चतुर्थी से जुड़ी प्रचलित व्रत-कथा में कहा जाता है कि चन्द्रमा ने श्रीगणेश के स्वरूप का उपहास किया। कथा के लोक-प्रचलित रूपों में श्रीगणेश ने चन्द्रमा को शाप दिया और बाद में देवताओं की प्रार्थना पर उसका शमन किया। इसी प्रसंग के कारण चतुर्थी पर चन्द्र-दर्शन से सावधानी रखने की मान्यता जोड़ी जाती है।

परंपरानुसार इस मान्यता का संबंध श्रीकृष्ण और स्यमन्तक-मणि के प्रसंग से भी बताया जाता है। श्रीकृष्ण पर मणि की चोरी का आरोप लगा, पर उन्होंने सत्य की खोज कर आरोप का निवारण किया। स्यमन्तक-मणि का आख्यान श्रीमद्भागवत की कथा-परंपरा में मिलता है, जबकि उसे गणेश चतुर्थी के चन्द्र-दर्शन-व्रत से जोड़ने का रूप व्रत-कथा और धर्मसिंधु-आधारित परंपराओं में लोकप्रिय है।

कथा का भाव यह है कि उपहास, भ्रम और असत्य आरोप से बचते हुए विनय, विवेक और सत्य का आश्रय लिया जाए।

क्षेत्रीय कथा-परंपराएँ

महाराष्ट्र, दक्षिण भारत और अन्य क्षेत्रों में गणेशजी के प्राकट्य, दूर्वा, मोदक, स्थापना और विसर्जन से जुड़ी कथाएँ अलग-अलग रूपों में सुनाई जाती हैं। इन्हें स्थानीय अथवा लोक-परंपरा के रूप में समझना उचित है; सभी कथाओं को किसी एक पुराण का शब्दशः वर्णन मानना आवश्यक नहीं है।

विसर्जन और उत्सव-अवधि

गणेशोत्सव की अवधि परिवार, क्षेत्र और मंडल की परंपरा के अनुसार एक दिन, डेढ़ दिन, तीन दिन, पांच दिन, सात दिन या अनंत चतुर्दशी तक हो सकती है। सभी परिवारों के लिए केवल दसवें या ग्यारहवें दिन विसर्जन अनिवार्य नहीं है। विसर्जन के समय स्थानीय प्रशासन के पर्यावरण और जल-सुरक्षा निर्देशों का पालन करें।

विसर्जन की परंपरा और भावार्थ के लिए गणपति विसर्जन: गणपति बप्पा मोरया पढ़ें।

स्रोत-टिप्पणी

२०२६ की तिथि और नगरानुसार मध्याह्न पूजा-समय का मिलान प्रकाशित पंचांग-सूचियों से किया गया है। नई दिल्ली के लिए विभिन्न स्रोतों में ११:०२ से १:३०/१:३१ अपराह्न तथा मुंबई के लिए लगभग ११:२० से १:४८ अपराह्न का अंतराल मिलता है। पंचांग-गणना स्थान-विशिष्ट होती है; पूजा से पहले अपने नगर का अद्यतन स्थानीय पंचांग अवश्य देख लें।

Share this knowledge

Comments

: