कजरी तीज, जिसे अनेक स्थानों पर कजली तीज, बड़ी तीज, सातूड़ी तीज, सतवा तीज अथवा बूढ़ी तीज जैसे क्षेत्रीय नामों से जाना जाता है, वर्षा-ऋतु और उत्तर भारतीय लोक-संस्कृति से जुड़ा पर्व है। यह केवल दाम्पत्य-संबंधों तक सीमित उत्सव नहीं है; इसमें परिवार की मंगलकामना, गौरी-शिव स्मरण, सावन-भादों के लोकगीत, सखियों का मिलन और स्थानीय रीति-रिवाजों की सुंदर विविधता भी शामिल है।
2026 में कजरी तीज कब है?
नई दिल्ली के पंचांगों के अनुसार कजरी तीज सोमवार, 31 अगस्त 2026 को मनाई जाएगी। यह पर्व सामान्यतः भाद्रपद कृष्ण पक्ष की तृतीया को आता है।
तृतीया तिथि, चंद्रोदय, पूजन और पारण का समय नगर, देशांतर तथा स्थानीय पंचांग-पद्धति के अनुसार बदल सकता है। इसलिए व्रत या पूजा के समय के लिए अपने नगर का विश्वसनीय पंचांग और परिवार की परंपरा अवश्य देखें।
कजरी, कजली, बड़ी और सातूड़ी तीज: नामों की क्षेत्रीय विविधता
इस पर्व के नाम और आचार एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में बदलते हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों में कजरी तीज की परंपराएं मिलती हैं। कहीं इसे कजली तीज कहा जाता है, कहीं बड़ी तीज या सातूड़ी तीज। इन नामों को हर स्थान पर बिल्कुल समान अर्थ वाला मानना उचित नहीं है, क्योंकि स्थानीय लोकाचार और पूजा-पद्धति अलग हो सकती है।
कई परिवारों में महिलाएं श्रद्धापूर्वक व्रत रखती हैं और सुख-शांति तथा पारिवारिक मंगल की कामना करती हैं। यह व्यक्तिगत आस्था और पारिवारिक परंपरा का विषय है; व्रत को किसी व्यक्ति पर अनिवार्य कर्तव्य के रूप में नहीं देखना चाहिए।
वर्षा-ऋतु, कजरी लोकगीत और स्त्रियों की लोक-स्मृति
कजरी तीज का सांस्कृतिक संसार वर्षा-ऋतु से गहराई से जुड़ा है। भादों के बादलों, हरियाली, विरह, मिलन, मायके की स्मृतियों और ऋतु के उल्लास को व्यक्त करने वाले कजरी लोकगीत इस पर्व की पहचान हैं। अनेक क्षेत्रों में स्त्रियां समूह में गीत गाती हैं, झूला झूलती हैं, मेंहदी लगाती हैं और पारंपरिक वस्त्र पहनती हैं।
इन गीतों में केवल धार्मिक भाव ही नहीं, बल्कि लोकजीवन की अनुभूतियां भी होती हैं—सखी-संग, परिवार, ऋतु-परिवर्तन, विरहिणी का मन और प्रकृति के प्रति अनुराग। इसी कारण कजरी तीज को लोक-संगीत और स्त्री-लोक परंपरा के महत्वपूर्ण अवसर के रूप में भी देखा जाता है।
घर-घर में बदलती व्रत और पूजा की परंपराएं
कजरी तीज की कोई एक सार्वदेशिक, अनिवार्य पूजा-विधि नहीं है। अलग-अलग घरों और क्षेत्रों में प्रचलित आचार भिन्न हो सकते हैं। कुछ स्थानों पर गौरी या शिव-पार्वती का स्मरण किया जाता है, कुछ परिवारों में नीम की पूजा होती है, और कहीं सत्तू का भोग या प्रसाद विशेष माना जाता है।
- स्वच्छ स्थान पर इष्टदेव, गौरी या शिव-पार्वती का स्मरण किया जा सकता है।
- पुष्प, फल, जल, दीप और घर में उपलब्ध सात्त्विक सामग्री अर्पित करने की परंपरा अनेक परिवारों में है।
- सत्तू, मिठाई या मौसमी भोजन का उपयोग स्थानीय रीति के अनुसार होता है।
- कुछ क्षेत्रों में चंद्र-दर्शन या चंद्रमा को अर्घ्य देने का चलन मिलता है।
- व्रत निर्जल, फलाहार या सामान्य उपवास के रूप में रखा जाए या नहीं, यह स्थानीय और पारिवारिक परंपरा पर निर्भर है।
स्वास्थ्य की स्थिति, आयु, गर्भावस्था, औषधि-सेवन या चिकित्सकीय आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए व्रत का निर्णय करना उचित है। श्रद्धा का सार संयम, प्रार्थना और सद्भाव में है, कठिनाई में नहीं।
बूंदी की कजली तीज: राजस्थान की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान
राजस्थान के बूंदी नगर की कजली तीज विशेष रूप से प्रसिद्ध है। यहां यह पर्व धार्मिक श्रद्धा के साथ सार्वजनिक सांस्कृतिक आयोजन का रूप भी लेता है। देवी उमा या गौरी से जुड़ी शोभायात्रा, सजे हुए जुलूस, बाजारों की रौनक और लोक-उत्सवी वातावरण बूंदी की पहचान रहे हैं।
बूंदी की परंपरा को पूरे भारत की एकमात्र कजरी तीज-विधि नहीं मानना चाहिए। इसका महत्व इस बात में है कि यह स्थानीय इतिहास, राजस्थानी लोक-आस्था और उत्सवधर्मिता का विशिष्ट रूप प्रस्तुत करती है।
कजरी तीज, हरियाली तीज और हरतालिका तीज में अंतर
तीज के ये पर्व आपस में जुड़े हुए सांस्कृतिक भाव रखते हैं, किंतु इन्हें एक ही पर्व नहीं समझना चाहिए। इनके पक्ष, तिथि और क्षेत्रीय आचार अलग हैं।
- हरियाली तीज सामान्यतः श्रावण शुक्ल पक्ष की तृतीया से जुड़ी मानी जाती है और हरियाली, झूले तथा सावन के उत्सवों से विशेष संबंध रखती है।
- कजरी तीज सामान्यतः भाद्रपद कृष्ण पक्ष की तृतीया को आती है और कजरी लोकगीतों, वर्षा-ऋतु तथा अलग-अलग क्षेत्रीय व्रत-परंपराओं से जुड़ी है।
- हरतालिका तीज भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है और इसकी पूजा-व्रत परंपराएं अलग हैं। इसके विषय में विस्तार से हरतालिका तीज व्रत, विधि और कथा पढ़ें।
कथा और लोक-मान्यता को कैसे समझें?
कजरी तीज के साथ कई क्षेत्रों में व्रत-कथाएं सुनने या पढ़ने की परंपरा है। इन कथाओं के रूप गांव, समुदाय और परिवार के अनुसार अलग हो सकते हैं। शिव-पार्वती या गौरी-स्मरण से इसका संबंध व्यापक लोक-मान्यता में मिलता है, किंतु प्रत्येक प्रचलित कथा को किसी पुराण का सर्वमान्य प्रमाणित आख्यान कहना उचित नहीं है।
यदि आपके घर में कजरी तीज की पारंपरिक कथा सुनाई जाती है, तो उसे परिवार की श्रद्धापूर्ण लोक-परंपरा के रूप में ग्रहण करें। पूजा के समय कथा से अधिक महत्वपूर्ण भाव विनम्रता, कृतज्ञता, पारिवारिक सद्भाव और प्रकृति के प्रति सम्मान का है। भक्ति के व्यापक अर्थ पर विचार के लिए नवधा भक्ति के नौ रूप भी पढ़े जा सकते हैं।
कजरी तीज / सातुड़ी तीज व्रत कथा
एक गाँव में एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ रहता था। दोनों धर्मपरायण थे, लेकिन घर की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर थी। भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष तृतीया आई। यह कजरी तीज, जिसे कई स्थानों पर सातुड़ी तीज या बड़ी तीज भी कहा जाता है, का दिन था।
ब्राह्मणी ने निश्चय किया कि वह श्रद्धा से तीज माता का व्रत करेगी। पूजा के लिए सत्तू की आवश्यकता थी। उसने अपने पति से कहा, “आज मेरा तीज माता का व्रत है। किसी प्रकार चने का सत्तू ले आइए, ताकि विधिपूर्वक पूजा हो सके।”
ब्राह्मण बहुत चिंतित हुआ। घर में धन नहीं था और उधार मिलने की भी संभावना नहीं थी। वह नगर में बहुत भटका, पर कहीं व्यवस्था नहीं हुई। पत्नी की श्रद्धा देखकर वह और व्याकुल हो उठा।
रात्रि में वह एक साहूकार की दुकान के पास पहुँचा। दुकान बंद हो चुकी थी। ब्राह्मण का मन चोरी का नहीं था, पर पत्नी के व्रत और पूजा की चिंता में उसने सोचा कि केवल आवश्यक मात्रा में चना लेकर उसका सत्तू बना लेगा और अवसर मिलने पर उसका मूल्य लौटा देगा।
जैसे ही वह दुकान में प्रवेश कर कुछ चना लेने लगा, साहूकार जाग गया। उसने ब्राह्मण को पकड़ लिया और पूछा, “तुम चोरी क्यों कर रहे हो?”
ब्राह्मण ने हाथ जोड़कर सारी बात सच-सच बता दी। उसने कहा, “मेरी पत्नी ने आज कजरी तीज का व्रत रखा है। घर में सत्तू बनाने तक के लिए कुछ नहीं है। मैं धन या आभूषण लेने नहीं आया। केवल पूजा के लिए थोड़ा चना चाहिए था।”
ब्राह्मण की सच्चाई और पत्नी की श्रद्धा सुनकर साहूकार का हृदय पिघल गया। उसने कहा, “आज से तुम्हारी पत्नी मेरी धर्मबहन हुई। तुम चोरी करके नहीं, अपने भाई के घर से सामग्री लेकर जा रहे हो।”
साहूकार ने ब्राह्मण को भरपूर सत्तू, वस्त्र, मेहंदी, श्रृंगार-सामग्री और आवश्यक धन देकर विदा किया। ब्राह्मण प्रसन्न होकर घर लौटा।
ब्राह्मणी ने श्रद्धा से तीज माता और नीमड़ी माता का पूजन किया, कथा सुनी, चंद्रमा को अर्घ्य दिया और व्रत पूर्ण किया। कहा जाता है कि तीज माता की कृपा से धीरे-धीरे उस परिवार के दुःख दूर होने लगे और घर में सुख-समृद्धि आई।
कथा का भाव यह है कि व्रत का वास्तविक फल केवल बाहरी विधि में नहीं, बल्कि श्रद्धा, सत्य, धर्म और करुणा में है। जिस प्रकार साहूकार ने ब्राह्मण की विवशता को समझकर सहायता की, उसी प्रकार धर्म हमें दूसरे के दुःख को समझने और सहायता करने की प्रेरणा देता है।
अंत में प्रार्थना की जाती है:
हे तीज माता! जिस प्रकार आपने उस ब्राह्मण परिवार के दुःख दूर किए, उसी प्रकार इस कथा को श्रद्धा से कहने, सुनने और स्मरण करने वाले सभी परिवारों पर अपनी कृपा बनाए रखें।
यह कथा विभिन्न क्षेत्रों में कुछ घटनाओं और पात्रों के छोटे-मोटे अंतर के साथ सुनाई जाती है; इसका मूल भाव श्रद्धा, दाम्पत्य मंगल, पारिवारिक कल्याण और धर्मपालन है।
नीमड़ी माता कथा भी साथ रखना चाहिए
राजस्थान और आसपास की परंपराओं में नीमड़ी माता की कथा भी कजरी/सातुड़ी तीज से विशेष रूप से जुड़ी मिलती है। कुछ परंपराओं में सास-बहू द्वारा संतान की मनौती, नीमड़ी माता के पूजन और प्रतिज्ञा पूरी करने की कथा सुनाई जाती है।
कजरी तीज का सरल भाव
कजरी तीज वर्षा-ऋतु की कोमलता, लोकगीतों की मिठास और रिश्तों में मंगलभाव का पर्व है। कोई इसे व्रत के रूप में मनाए, कोई गीत-संगीत और पारिवारिक मिलन के रूप में—इसकी आत्मा श्रद्धा, परंपरा और सामूहिक आनंद में है। क्षेत्रीय भिन्नताओं का सम्मान करते हुए मनाया गया यह पर्व भारतीय लोक-संस्कृति की जीवंतता को सामने लाता है।
स्रोत-टिप्पणी
2026 की तिथि नई दिल्ली के लिए उपलब्ध पंचांग स्रोतों के आधार पर दी गई है। तिथि-समय स्थानानुसार बदल सकते हैं: एस्ट्रोसेज पंचांग, पंचांगटाइम और बूंदी की सांस्कृतिक परंपरा के लिए राजस्थान पर्यटन विभाग देखें।
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