शिवजी की आरती
कर्पूरगौरं करुणावतारं, संसारसारं भुजगेन्द्रहारम् |
सदावसन्तं हृदयारविन्दे, भवं भवानीसहितं नमामि ||

ॐ जय शिव ॐकारा, स्वामी हर शिव ॐकारा |
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्धांगी धारा || - ॐ जय शिव ॐकारा

एकानन चतुरानन पंचानन राजे, स्वामी पंचानन राजे |
हंसासन गरुड़ासन वृष वाहन साजे || - ॐ जय शिव ॐकारा

दो भुज चारु चतुर्भुज दस भुज से सोहे, स्वामी दस भुज से सोहे |
तीनों रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे || - ॐ जय शिव ॐकारा

अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी, स्वामि मुण्डमाला धारी |
चंदन मृग मद सोहे भाले शशि धारी || - ॐ जय शिव ॐकारा

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघाम्बर अंगे, स्वामी बाघाम्बर अंगे |
सनकादिक ब्रह्मादिक भूतादिक संगे || - ॐ जय शिव ॐकारा

कर में श्रेष्ठ कमण्डलु चक्र त्रिशूल धरता, स्वामी चक्र त्रिशूल धरता |
जगकर्ता जगहर्ता जग पालन कर्ता || - ॐ जय शिव ॐकारा

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका, स्वामि जानत अविवेका |
प्रणवाक्षर में शोभित यह तीनों एका || - ॐ जय शिव ॐकारा

निर्गुण शिवजी की आरती जो कोई नर गावे, स्वामि जो कोई नर गावे |
कहत शिवानंद स्वामी मन वाँछित फल पावे || - ॐ जय शिव ॐकारा


|| ॐ नमः पार्वती पतये हर हर महादेव  ||
' शिव महिम्नस्तोत्र ' भगवान शिव के भक्तों के बीच काफी लोकप्रिय है, भगवान शिव की प्रार्थना के बीच सर्वश्रेष्ठ में से एक माना जाता है | इस स्तोत्र की रचना की परिस्थितियों के बारे में कथा इस प्रकार है|

एक बार चित्ररथ नाम के राजा ने एक अच्छा बगीचा निर्माण किया था| इस बगीचे में सुंदर फूल लग रहे थे. इन फूलों को हर दिन वह राजा भगवान शिव की पूजा में इस्तेमाल किया करता था |

एक गंधर्व जिसका नाम पुष्पदंत Pushpadant, इंद्र के दरबार में गायक था, एक दिन  सुंदर फूलों से मोहित हो कर उन्हें चुराने लगा , परिणाम स्वरुप राजा Chitraratha फूल भगवान शिव को अर्पित नहीं कर पा रहे थे | राजा बहुत कोशिश करने के बाद भी चोर को पकड़ने में असफल रहे  क्योंकि गन्धर्व में अदृश्य रहने की शक्ति थी |

अंत में राजा ने अपने बगीचे में शिव निर्माल्य फैला दिया | शिव निर्माल्य - बिल्व पत्र , फूल, वगैरह जो भगवान शिव की पूजा में इस्तेमाल किया गया है उसे कहते हैं | शिव निर्माल्य बहुत पवित्र माना जाता है|

चोर पुष्पदंत, यही नहीं जानते हुए, शिव निर्माल्य के ऊपर से चला गया, और उस से वह भगवान शिव के क्रोध का पात्र बन पड़ा | पुष्पदंत ने अपनी दिव्य शक्तिया खो दी | उसने क्षमा याचना के लिए भगवान शिव की महिमा स्तोत्र की रचना की | इस प्रार्थना में उसने शिव प्रभु की महानता को गाया |

भगवान शिव की कृपा से यह स्तोत्रं  बन गया है, और पुष्पदंत की दिव्य शक्तिया लौट आयी | यह प्रार्थना `शिव महिम्नस्तोत्र ' के रूप में जाना गया |


Maha Shivaratri Vrat : Fri, 24 February 2017


Maha Shivratri falls on the 13th (or 14th) day of the dark half of Phalgun (February-March). The name means “the night of Shiva”. The ceremonies take place chiefly at night. This is a festival observed in honour of Lord Shiva. Shiva was married to Parvati on this day.

People observe a strict fast on Maha Shivaratri. Some devotees do not even take a drop of water. They keep vigil all night. The Shiva Lingam is worshipped throughout the night by washing it every three hours with milk, curd, honey, rose water, etc., whilst the chanting of the Mantra Om Namah Shivaya continues. Offerings of bael leaves are made to the Lingam. Bael leaves are very sacred as, it is said, Lakshmi resides in them.

Maha Shivratri Stotra & Mantra


On Maha Shivaratri Hymns in praise of Lord Shiva, such as the Shiva Mahimna Stotra of Pushpadanta or Ravana’s Shiva Tandava Stotra are sung with great fervour and devotion. People repeat the Panchakshara Mantra, Om Namah Shivaya.

He who utters the Names of Shiva during Maha Shivaratri, with perfect devotion and concentration, is freed from all sins. He reaches the abode of Shiva and lives there happily. He is liberated from the wheel of births and deaths. Many pilgrims flock to the places where there are Shiva temples.


Smearing ash (bhasma) & Wearing of rudraksha during Shiva Puja

The devotee worshipping Lord Shiva should smear holy ash on his forehead in three horizontal stripes - Tripundra. The stripes symbolize Absolute Knowledge, Purity and Penance (Yogasadhana).

The devotee should wear a rudraksha beads' mala while worshipping Lord Shiva on Maha Shivaratri. The rudraksha is red in color with yellow stripes and its shape is flat like that of a fish. On one side of each bead is a slight opening, which appears like an open mouth.

A brief on Maha Shivaratri Vrat Sankalp and Puja Vidhi is also available in Hindi.

Maha Shivaratri - महाशिवरात्रि 

Friday, 24 February 2017

महाशिवरात्रि पूजाविधि

शिवपुराणके अनुसार व्रती पुरुषको महाशिवरात्रि के दिन प्रातःकाल उठकर स्न्नान-संध्या आदि कर्मसे निवृत्त होनेपर मस्तकपर भस्मका त्रिपुण्ड्र तिलक और गलेमें रुद्राक्षमाला धारण कर शिवालयमें जाकर शिवलिंगका विधिपूर्वक पूजन एवं शिवको नमस्कार करना चाहिये। तत्पश्चात्‌ उसे श्रद्धापूर्वक महाशिवरात्रि व्रतका इस प्रकार संकल्प करना चाहिये-
शिवरात्रिव्रतं ह्यतत्‌ करिष्येऽहं महाफलम्‌।
निर्विघ्नमस्तु मे चात्र त्वत्प्रसादाज्जगत्पते॥

महाशिवरात्रि के प्रथम प्रहर में संकल्प करके दूध से स्नान तथा `ओम हीं ईशानाय नम:’ का जाप करें। द्वितीय प्रहर में दधि स्नान करके `ओम हीं अधोराय नम:’ का जाप करें। तृतीय प्रहर में घृत स्नान एवं मंत्र `ओम हीं वामदेवाय नम:’ तथा चतुर्थ प्रहर में मधु स्नान एवं `ओम हीं सद्योजाताय नम:’ मंत्र का जाप करें।

महाशिवरात्रि मंत्र एवं समर्पण


सम्पूर्ण - महाशिवरात्रि पूजा विधि के दौरान 'ओम नम: शिवाय’ एवं 'शिवाय नम:’ मंत्र का जाप करना चाहि‌ए। ध्यान, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, पय: स्नान, दधि स्नान, घृत स्नान, गंधोदक स्नान, शर्करा स्नान, पंचामृत स्नान, गंधोदक स्नान, शुद्धोदक स्नान, अभिषेक, वस्त्र, यज्ञोपवीत, उवपसत्र, बिल्व पत्र, नाना परिमल दव्य, धूप दीप नैवेद्य करोद्वर्तन (चंदन का लेप) ऋतुफल, तांबूल-पुंगीफल, दक्षिणा उपर्युक्त उपचार कर ’समर्पयामि’ कहकर पूजा संपन्न करें। कपूर आदि से आरती पूर्ण कर प्रदक्षिणा, पुष्पांजलि, शाष्टांग प्रणाम कर महाशिवरात्रि पूजन कर्म शिवार्पण करें।

महाशिवरात्रि व्रत प्राप्त काल से चतुर्दशी तिथि रहते रात्रि पर्यन्त करना चाहि‌ए। रात्रि के चारों प्रहरों में भगवान शंकर की पूजा-अर्चना करने से जागरण, पूजा और उपवास तीनों पुण्य कर्मों का एक साथ पालन हो जाता है और भगवान शिव की विशेष अनुकम्पा और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

Maha Shivaratri Vrat Katha - महाशिवरात्रि की व्रत-कथा
Celebrate Maha Shivaratri on Friday, 24 February 2017

एक बार पार्वती ने भगवान शिवशंकर से पूछा, 'ऐसा कौन सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत-पूजन है, जिससे मृत्यु लोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं?'

उत्तर में शिवजी ने पार्वती को 'शिवरात्रि' के व्रत का विधान बताकर यह कथा सुनाई- 'एक गाँव में एक शिकारी रहता था। पशुओं की हत्या करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था। वह एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधवश साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी।

शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि की कथा भी सुनी। संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया।

अपनी दिनचर्या की भाँति वह जंगल में शिकार के लिए निकला, लेकिन दिनभर बंदीगृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा। बेल-वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो बिल्वपत्रों से ढँका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला।

पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियाँ तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरीं। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए।

एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुँची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, मृगी बोली, 'मैं गर्भिणी हूँ। शीघ्र ही प्रसव करूँगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं अपने बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे सामने प्रस्तुत हो जाऊँगी, तब तुम मुझे मार लेना।' शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी झाड़ियों में लुप्त हो गई।

कुछ ही देर बाद एक और मृगी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख मृगी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, 'हे पारधी ! मैं थोड़ी देर पहले ही ऋतु से निवृत्त हुई हूँ। कामातुर विरहिणी हूँ। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूँ। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊँगी।'

शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर न लगाई, वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, 'हे पारधी! मैं इन बच्चों को पिता के हवाले करके लौट आऊँगी। इस समय मुझे मत मार।'

शिकारी हँसा और बोला, 'सामने आए शिकार को छोड़ दूँ, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूँ। मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़प रहे होंगे।'

उत्तर में मृगी ने फिर कहा, 'जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी, इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान माँग रही हूँ। हे पारधी! मेरा विश्वास कर मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूँ।'

मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के आभाव में बेलवृक्ष पर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्व करेगा।

शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला,' हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि उनके वियोग में मुझे एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े। मैं उन मृगियों का पति हूँ। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण जीवनदान देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे सामने उपस्थित हो जाऊँगा।'

मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटना-चक्र घूम गया। उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, 'मेरी तीनों पत्नियाँ जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएँगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूँ।'

उपवास, रात्रि जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था। उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था। धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गए। भगवान शिव की अनुकम्पा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा।

थोड़ी ही देर बाद मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसके नेत्रों से आँसुओं की झड़ी लग गई। उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया।

देव लोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहा था। घटना की परिणति होते ही देवी-देवताओं ने पुष्प वर्षा की। तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए।'

Maha Shivratri Vrat - Friday, 24 February 2017

In the Shanti Parva of the Mahabharata, Bhishma, whilst resting on the bed of arrows and discoursing on Dharma, refers to the observance of Maha Shivaratri by King Chitrabhanu.



The story (Vrat Katha) goes as follows....

Once upon a time King Chitrabhanu of the Ikshvaku dynasty, who ruled over the whole of Jambudvipa, was observing a fast with his wife, it being the day of Maha Shivaratri.

The Sage Ashtavakra came on a visit to the court of the king.

The sage asked, “O king! why are you observing a fast today?”

King Chitrabhanu explained why. He had the gift of remembering the incidents of his previous birth.

The king said to the sage: “In my past birth I was a hunter in Varanasi. My name was Suswara. My livelihood was to kill and sell birds and animals. One day I was roaming the forests in search of animals. I was overtaken by the darkness of night. Unable to return home, I climbed a tree for shelter. It happened to be a bael tree. I had shot a deer that day but I had no time to take it home. I bundled it up and tied it to a branch on the tree. As I was tormented by hunger and thirst, I kept awake throughout the night. I shed profuse tears when I thought of my poor wife and children who were starving and anxiously awaiting my return. To pass away the time that night I engaged myself in plucking the bael leaves and dropping them down onto the ground. “The day dawned. I returned home and sold the deer. I bought some food for myself and for my family. I was about to break my fast when a stranger came to me, begging for food. I served him first and then took my food.

“At the time of death, I saw two messengers of Lord Shiva. They were sent down to conduct my soul to the abode of Lord Shiva. I learnt then for the first time of the great merit I had earned by the unconscious worship of Lord Shiva during the night of Shivaratri. They told me that there was a Lingam at the bottom of the tree. The leaves I dropped fell on the Lingam. My tears which I had shed out of pure sorrow for my family fell onto the Lingam and washed it. And I had fasted all day and all night. Thus did I unconsciously worship the Lord. “I lived in the abode of the Lord and enjoyed divine bliss for long ages. I am now reborn as Chitrabhanu.”



"Om Namah Shivaya" 

Maha Shivaratri Puja

Maha Shivaratri -  पूजा एवं शिव अभिषेक

Date for Maha shivaratri Celebrations 2017

Fri, 24 February 2017
Chaturdashi tithi start: 21:38 hrs (24 Feb)
Chaturdashi Tithi ends: 21:20 hrs (25 Feb)

महाशिवरात्रि व्रत को अर्धरात्रि व्यापिनी चतुर्दशी तिथि में करना चाहिये, चाहे यह तिथि पूर्वा (त्रयोदशीयुक्त ) हो, चाहे परा हो | नारद संहिता के अनुसार जिस दिन फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशीतिथि आधी रातके योगवाली हो उस दिन जो शिवरात्रिव्रत करता है , वह अनंत फल को प्राप्त करता है |

महाशिवरात्रि को रात्रि के चारों प्रहारों की पूजा का विधान है | सायंकाल स्नान करके किसी शिवमंदिर में जाकर अथवा घरपर ही (यदि नर्मदेश्वर अथवा इसी प्रकार का शिवलिंग हो) सुविधा अनुसार पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख होकर और तिलक एवं रुद्राक्ष धारण करके पूजाका इस प्रकार संकल्प करे -

ममाखिलपापक्षयपूर्वकसकलाभीष्टसिद्धये शिवप्रीत्यर्थं च शिवपूजनमहं करिष्ये |


व्रती को पूजा की सामग्री अपने पास रखनी चाहिये - ऋतुकाल फल - पुष्प , गंध  (चन्दन), बिल्वपत्र, धतुरा , धूप , दीप और नैवैध आदिद्वारा चारो प्रहरकी पूजा करनी चाहिये | दूध , दही , घी , शहद और शक्करसे अलग - अलग तथा सबको एक साथ मिलाकर पंचामृतसे शिवको स्नान कराकर जलधारा से उनका अभिषेक करना चाहिये | चारों पूजनो में पंचोपचार अथवा षोड़शोउपचार , यथालब्धोपचारसे पूजन करते समय शिवपञ्चाक्षर 'नमः शिवाय' मंत्रसे अथवा रूद्र पाठ से भगवान् का जलाभिषेक करना चाहिए |

भव, शर्व, रूद्र, पशुपति, उग्र, महान, भीम और ईशान  - इन आठ नामोंसे पुष्पांजलि अर्पितकर भगवानकी आरती और परिक्रमा करनी चाहिये |

अंतमें भगवान शम्भूसे इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये -

'हे महादेव ! आपकी आज्ञासे मैंने जो व्रत किया , हे स्वामिन ! वह परम उत्तम व्रत पूर्ण हो गया | अतः अब उसका विसर्जन करता हूँ | हे देवेश्वर शर्व ! यथाशक्ति किये गये इस व्रतसे आप आज मुझपर कृपा करके संतुष्ट  हों |'

अशक्त होने पर यदि चारों प्रहर की पूजा न हो सके तो पहले प्रहर की पूजा अवश्य करनी चाहिये और अगले दिन प्रात:काल पुनः स्नानकर भगवान् शंकर की पूजा करने के पश्चात व्रत की पारणा करनी चाहिये |
स्कन्दपुराण के अनुसार इस प्रकार अनुष्ठान करते हुए शिवजी का पूजन, जागरण और उपवास करने वाले मनुष्यका पुनर्जन्म नहीं होता |

Sri Lingashtakam  - Shiva Mantra Stuti

श्री लिंगाष्टकम

Meaning

I continuously bow to that Linga of Siva, Which is honored by Brahma, Murari and Indra, Which is adorned and resplendent by clear light, and Which destroys the grief born out of the birth.||1||

I continuously bow to that Linga of Siva, Which is honored by demi-gods and the best sages, Which destroys the fear of Kamadeva or desires, Which is the abode of compassion, and Which destroyed the pride of the demon Ravana.||2||

I continuously bow to that Linga of Siva, Which is applied and covered by a fragrant paste, Which is the reason for the increment of wisdom in persons, and Which has been extolled by siddha, demi-gods and demons alike.||3||

I continuously bow to that Linga of Siva, Which is adorned with gold and grand precious jewels, Which is surrounded and adorned by a garland of the king of snakes (Naga), and Which destroyed the grand sacrifice of Daksa Prajapati in the old times.||4||

I continuously bow to that Linga of Siva, Which is applied by a paste of sandalwood and kumkuma, Which is adorned by a garland of lotuses, and Which destroys the accumulated sins of living beings.||5||

I continuously bow to that Linga of Siva, Which is honoured by demi-gods and the Gana of Siva, possessed with devotional emotions, and Which is resplendent with light like millions of sun.||6||

I continuously bow to that Linga of Siva, Which is surrounded by flowers having eight-petals, Which is the reason behind the birth of everything, and Which destroys the eight types of poverty.||7||

I continuously bow to that Linga of Siva, Which is revered by demi-gods, preceptors and Indra, Which is offered wild-flowers, from forests, by the demi-gods, Which is beyond everything, and Which is like the Paramatman.||8||


Rudrashtakam – Eightfold Hymn of praise to please Lord Shiva


Meaning:

I bow to the Ruler of the Universe, whose very form is Liberation,the omnipotent and all pervading Brahma, manifest as the Vedas. I worship Shiva, shining in his own glory, without physical qualities,Undifferentiated, desireless, all pervading sky of consciousness and wearing the sky itself as His garment. ||1||
I bow to the supreme Lord who is the formless source of “OM” The Self of All, transcending all conditions and states,
Beyond speech, understanding and sense perception, Awe-full, but gracious, the ruler of Kailash, Devourer of Death, the immortal abode of all virtues. ||2||
I worship Shankara, whose form is white as the Himalyan snow, Radiant with the beauty of countless Cupids, Whose head sparkles with the Ganga. With crescent moon adorning his brow and snakes coiling his neck ||3||
The beloved Lord of All, with shimmering pendants hanging from his ears, Beautiful eyebrows and large eyes, Full of Mercy with a cheerful countenance and a blue speck on his throat. ||4||
I worship Shankara, Bhavani’s husband,The fierce, exalted, luminous supreme Lord.Indivisible, unborn and radiant with the glory of a million suns; Who, holding a trident, tears out the root of the three-fold suffering,And who is reached only through Love. ||5||
You who are without parts, ever blessed, The cause of universal destruction at the end of each round of creation, A source of perpetual delight to the pure of heart,Slayer of the demon, Tripura, consciousness and bliss personified,
Dispeller of delusion Have mercy on me, foe of Lust. ||6||
Oh Lord of Uma, so long as you are not worshipped there is no happiness, peace or freedom from suffering in this world or the next. You who dwell in the hearts of all living beings, and in whom all beings have their existence, Have mercy on me, Lord. ||7||
I don’t know yoga, prayer or rituals, But everywhere and at every moment, I bow to you, Shambhu! Protect me my Lord, miserable and afflicted as I am with the sufferings of birth, old-age and death. ||8||
This eightfold hymn of praise was sung by the Brahman to please Shankara. Shambhu will be pleased with whomever heartfully recites it.


Aum Jai Saraswati Mata Aarti

आरती ॐ जय सरस्वती माता

ॐ ऐं सरस्वत्ये नमः

ॐ जय सरस्वती माता, मैया जय सरस्वती माता।
सद्गुण, वैभवशालिनि, त्रिभुवन विख्याता ।। ॐ जय...

चन्द्रवदनि, पद्मासिनि द्युति मंगलकारी।
सोहे हंस-सवारी, अतुल तेजधारी।। ॐ जय...

बायें कर में वीणा, दूजे कर माला।
शीश मुकुट-मणि सोहे, गले मोतियन माला ।। ॐ जय...

देव शरण में आये, उनका उद्धार किया।
पैठि मंथरा दासी, असुर-संहार किया।। ॐ जय...

वेद-ज्ञान-प्रदायिनी, बुद्धि-प्रकाश करो।।
मोहज्ञान तिमिर का सत्वर नाश करो।। ॐ जय...

धूप-दीप-फल-मेवा-पूजा स्वीकार करो।
ज्ञान-चक्षु दे माता, सब गुण-ज्ञान भरो।। ॐ जय...

माँ सरस्वती की आरती, जो कोई जन गावे।
हितकारी, सुखकारी ज्ञान-भक्ति पावे।। ॐ जय...

ॐ ऐं सरस्वत्ये नमः

***


VASANT PANCHAMI -  Wed, 1 February 2017

 सरस्वति महाभागे विद्ये कमललोचने ।
विद्यारूपे विशालाक्षि विद्यां देहि नमोस्तुते ॥

"O Devi Saraswati, the most Auspicious Goddess of Knowledge with Lotus-like Eyes, An Embodiment of Knowledge with Large Eyes, Kindly Bless me with Knowledge. I Salute you."
जिनकी कांति हिम, मुक्ताहार, कपूर तथा चंद्रमा की आभा के समान धवल है, जो परम सुंदरी हैं और चिन्मय शुभ-वस्त्र धारण किए हुए हैं, जिनके एक हाथ में वीणा है और दूसरे में पुस्तक। जो सर्वोत्तम रत्नों से जड़ित दिव्य आभूषण पहने श्वेत पद्मासन पर अवस्थित हैं। जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव प्रभृति प्रधान देवताओं और सुरगणों से सुपूजित हैं, सब श्रेष्ठ मुनि जिनके चरणों में मस्तक झुकाते हैं। ऐसी भगवती सरस्वती का मैं भक्तिपूर्वक चिंतन एवं ध्यान करता हूँ। उन्हें प्रणाम करता हूँ। वे सर्वदा मेरी रक्षा करें और मेरी बुद्धि की जड़ता इत्यादि दोषों को सर्वथा दूर करें।

माघ शुक्ल पंचमी से बसंत ऋतु की शुरूआत होती है जो फाल्गुन कृष्ण पंचमी को पूर्ण होती है। बसंत पंचमी का दिन सभी प्रकार के कार्यों के लिए शुभ माना गया है। मलमास समाप्ति के बाद यह सबसे अधिक शुभ दिन होता है। किंवदंती है कि इसी दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना की थी।

लेखन, साहित्य, कला और विशेषकर विद्यार्थियों के लिए बसंत पंचमी का दिन विशेष महत्व वाला होता है क्योंकि आज ही के दिन ज्ञान की देवी मां सरस्वती का प्राकट्य हुआ था। मां सरस्वती की कृपा से ही विद्या, बुद्धि, वाणी और ज्ञान की प्राप्ति होती है। देवी कृपा से ही कवि कालिदास ने यश और ख्याति अर्जित की थी। वाल्मीकि, वसिष्ठ, विश्वामित्र, शौनक और व्यास जैसे महान ऋषि देवी-साधना से ही कृतार्थ हुए थे। चूंकि मां सरस्वती की उत्पत्ति सत्वगुण से मानी जाती है, इसलिए इन्हें श्वेत वर्ण की सामग्रियां विशेष प्रिय हैं। जैसे- श्वेत पुष्प, श्वेत चंदन, दूध, दही, मक्खन, श्वेत वस्त्र और श्वेत तिल के लड्डू।

मार्कण्डेय पुराण में वर्णित सरस्वती के "घंटा शूलहलानि..." श्लोकों के जाप व हवन करने से बुद्धि कुशाग्र होती है। कलियुग में दान का महत्व बसंतोत्सव में प्रमुख है। इस दिन पीत वस्त्र एवं आभूषणादि का दान सरस्वती पूजा कर कुमारियों, विप्रों व निर्धनों को देने से घर में धन-धान्य की वृद्धि होती है। इस ऋतु में पीले पुष्पों से शिवलिंग की पूजा करने से भक्तजन तेजस्वी दीर्घायु होते हैं। बसंत पंचमी के दिन शुभ कार्य (विवाह, भवन निर्माण, कूप निर्माण, फैक्ट्री आदि का शुभारंभ, कॉलेज आदि की स्थापना) किया जाता है।



Basant Panchami Pujan Vidhi - Sankalp, Dhyaan Mantra & Stuti

माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथिको (Wed, 1 February 2017) प्रात:काल में सरस्वती देवी की पूजा करनी चाहिए | घट (कलश) की स्थापना कर के उसमे वाग्देवी का आवाहन करे तथा विधि पूर्वक देवी सरस्वती की पूजा करे | सर्व-पर्थम आचमन , प्राणायामआदि द्वारा अपनी बह्याभ्यंतर शुचिता सम्पन्न करे | फिर सरस्वती पूजन का संकल्प ग्रहण करे |

संकल्प

यथोपलब्धपूजनसामग्रीभिः भगवत्या: सरस्वत्या: पूजनमहं करिष्ये |

तत्पश्चात श्रीगणेश की आदिपूजा करके कलश स्थापित कर उसमे देवी सरस्वतीका सादर आवाहन करके वैदिक या पौराणिक मंत्रो का उचारण करते उपचार -सामग्रियां भगवती को सादर समर्पित करे |
वेदोक्त अष्टाक्षरयुक्त मंत्र सरस्वतीका मूलमंत्र है |

श्रीं ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा |

इस अष्टाक्षर-मंत्र से पूजन सामग्री समर्पित करते हुए देवी की आरती करके स्तुति करे |
मां सरस्वती की आराधना करने के लिए श्लोक है-

सरस्वती शुक्ल वर्णासस्मितांसुमनोहराम।

कोटिचन्द्रप्रभामुष्टश्री युक्त विग्रहाम।

वह्निशुद्धांशुकाधानांवीणा पुस्तक धारिणीम्।

रत्नसारेन्द्रनिर्माण नव भूषण भूषिताम।

सुपूजितांसुरगणैब्रह्म विष्णु शिवादिभि:।

वन्दे भक्त्यावन्दितांचमुनीन्द्रमनुमानवै:।
- (देवीभागवत )



सत्वगुण से उत्पन्न होने के कारण इनकी पूजा में प्रयुक्त होने वाली सामग्रियों में अधिकांश श्वेत वर्ण की होती हैं। जैसे- श्वेत चंदन, पुष्प, परिधान, दही-मक्खन, धान का लावा, सफेद तिल का लड्डू, अदरक, श्वेत धान, अक्षत, शुक्ल मोदक, घृत, नारियल और इसका जल, श्रीफल, बदरीफल आदि।
12 Names of Ma Saraswati

देवी सरस्वती की प्रसिद्ध 'द्वादश नामावली' का पाठ करने पर भगवती प्रसन्न होती हैं-


प्रथमं भारती नाम द्वितीयं च सरस्वती।

तृतीयं शारदा देवी चतुर्थ हंस वाहिनी।।

पञ्चम जगतीख्याता षष्ठं वागीश्वरी तथा।

सप्तमं कुमुदी प्रोक्ता अष्टमें ब्रह्मचारिणी।।

नवमं बुद्धिदात्री च दशमं वरदायिनी।

एकादशं चन्द्रकान्ति द्वादशं भुवनेश्वरी।।

द्वादशैतानि नामानी त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः।

जिह्वाग्रे वसते नित्यं ब्रह्मरूपा सरस्वती ।।

तुलसीदास ने सबका मंगल करने वाली देवी को वाणी कहा है। वे देवी गंगा और सरस्वती को एक समान मानते हैं-
पुनि बंदउंसारद सुर सरिता। जुगल पुनीत मनोहर चरिता।

भज्जन पान पाप हर एका। कहत सुनत एक हर अविवेका।

Jai Ma Saraswati


Ganga Mahaotsav is a 5-day festival, held on the banks of Ganga in Varanasi, is celebrated every year from Prabodhani Ekadashi to Kartik Purnima (This year from 10 Nov 2016 to 14 Nov 2016*). The festival celebrates the rich cultural heritage of Varanasi.

The event also coincides with Dev Deepawali the festival of lights at Varanasi. On Dev Deepavali (full moon day) it is said that God descends from heaven to bathe in the Ganga. On this occasion amidst chanting of Vedic hymns people light diyas (earthen lamps) and burst firecrackers in welcome.


* Kartik Purnima - Dev Deepavali : Mon, 14 November 2016

Tulsi Vivah on  Fri 11 November 2016

कार्तिक शुक्ल एकादशी को शालिग्राम और तुलसी का विवाह रचाया जाता है। मान्यता है कि कार्तिक मास में जो व्यक्ति तुलसी का विवाह भगवान विष्णु से रचाता है उसके पिछले जन्मों का पाप नष्ट हो जाता है।

Dev Prabodhini Ekadashi Vrat: Thu, 10 November 2016

Bhisma Panchak Starting 10 NOV 2016 to 14 NOV 2016

यह व्रत कार्तिक शुक्ल एकादशी से प्रारंभ होकर पूर्णिमा तक चलता है। कहा जाता है कि महाभारत काल में जब देवव्रत भीष्म सूर्य के उत्रायण होने की प्रतिक्छा में शर शय्या पर थे तो उनही पांच दिनों के दौरान उन्होने पांडवों को राज धर्म, वर्ण धर्म, मोक्छ धर्म आदि पर उपदेश दिया था। श्री कृष्ण ने उनकी स्मृति में भीष्म पंचक व्रत की आयोजना की।

Baikuntha Chaturdashi Vrat on Sat, 12 Nov 2016

भगवान शिव और विष्णु की पूजा करनी चाहिये

कार्तिक मास के शुक्ल पक्छ की चतुर्दशी को यह व्रत किया जाता है। ऐसी मान्यता है की निःसंतान लोग यदि रात्रि के समय किसी नदी या तीर्थ में पूरी रात्रि तक खडे होकर हाथों में दीपक जलाएं तो संतान की प्राप्ति होती है।

Kartika Purnima on Mon, 14 November 2016

कार्तिक पूर्णिमा पवित्र पुनीत पर्व है। इसमें किये गये यग्य, दान, स्नान, साधना का फल असीम होता है। उस दिन यदि कृतिका हो तो महाकार्तिकी होती है। इसी दिन सायंकाल के समय मतस्यावतार हुआ था। अत: इस दिन किये गये दान का फल दस यग्यों के फल के बराबर है। इस दिन हरिद्वार, काशी (Varanasi), प्रयाग (Allahabad), पुष्कर आदि पुण्य तिर्थों में श्रध्दापूर्वक स्नान, दान करने से महा पुण्य फल की प्राप्ति होती है।
छठ पूजा - सूर्य षष्ठी

Chhath Puja (Chhathi Maiya Pujan)
Surya Shashthi Vrat : Sun, 6 November 2016

कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी को सूर्य षष्ठी का व्रत करने का विधान है । इसे करने वाली स्त्रियाँ धन-धान्य, पति-पुत्र तथा सुख-समृद्धि से परिपूर्ण रहती हैं। यह व्रत बडे नियम तथा निष्ठा से किया जाता है। इसमे तीन दिन के कठोर उपवास का विधान है । इस व्रत को करने वाली स्त्रियों को पंचमी को एक बार नमक रहित भोजन करना पडता है। षष्ठी को निर्जल रहकर व्रत करना पडता है । षष्ठी को अस्त होते हुए सूर्य को विधिपूर्वक पूजा करके अर्घ्य देते हैं। सप्तमी के दिन प्रात:काल नदी या तालाब पर जाकर स्नान करती हैं। सूर्योदय होते ही अर्घ्य देकर जल ग्रहण करके व्रत को खोलती हैं।

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सूर्यषष्ठी-व्रतके अवसरपर सायंकालीन प्रथम अर्घ्यसे पूर्व मिट्टीकी प्रतिमा बनाकर षष्ठीदेवीका आवाहन एवं पूजन करते हैं। पुनः प्रातः अर्घ्यके पूर्व षष्ठीदेवीका पूजन कर विसर्जन कर देते हैं। मान्यता है कि पंचमीके सायंकालसे ही घरमें भगवती षष्ठीका आगमन हो जाता है। इस प्रकार भगवान्‌ सूर्यके इस पावन व्रतमें शक्ति और ब्रह्म दोनोंकी उपासनाका फल एक साथ प्राप्त होता है । इसीलिये लोकमें यह पर्व ‘सूर्यषष्ठी’ के नामसे विख्यात है।

सूर्यषष्ठी-व्रतके प्रसादमें ऋतु-फलके अतिरिक्त आटे और गुडसे शुद्ध घीमें बने ‘ठेकुआ’ का होना अनिवार्य है; ठेकुआपर लकडीके साँचेसे सूर्यभगवान्‌के रथका चक्र भी अंकित करना आवश्यक माना जाता है। इस व्रत का प्रसाद माँगकर खानेका विधान है।