Damodar Krishna -  ISKCON desire tree
Shri Krishna Janmashtami: 25 August 2016

Sri Krishna Stuti

वंशीविभूषितकरान्नवनिरदाभात्‌
पीताम्बरादरुणविम्बफलाधरोष्ठात्‌ ।
पूर्णेन्दुसुन्दरमुखादरविन्दनेत्रात्‌
कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने ॥


“Lord Shree Krishna who has Flute in His hand,Whose Glory is spreading on all four corners of the Universe, Who is wearing yellow clothes, Whose face is glowing like full Moon and has beautiful glaring eyes. I do not know any other God except Lord God Shree Krishna.”
Krishna

गोविंद दामोदर स्तोत्र
Govind Damodar Madhaveti Stotra

अग्रे कुरूनाम् अथ पाण्डवानां दुःशासनेनाहृत वस्त्रकेशा ।
कृष्णा तदाक्रोशदनन्यनाथ गोविंद दामोदर माधवेति ॥

{जिस समय} कौरव और पाण्डवोंके सामने भरी सभामें दुःशासनने द्रौपदीके वस्त्र और बालोंको पकडकर खींचा, उस समय जिसका कोई दूसरा नाथ नहीं ऐसी द्रौपदीने रोकर पुकारा - ‘ हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव !’ ॥१॥

श्रीकृष्ण विष्णो मधुकैटभारे भक्तानुकम्पिन् भगवन् मुरारे ।
त्रायस्व माम् केशव लोकनाथ गोविंद दामोदर माधवेति ॥

‘हे श्रीकृष्ण ! हे विष्णो ! हे मधुकैटभको मारनेवाले ! हे भक्तोंके ऊपर अनुकम्पा करनेवाले ! हे भगवन्‌ ! हे मुरारे ! हे केशव ! हे लोकेश्वर ! हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव ! मेरी रक्षा करो, रक्षा करो’ ॥२॥

विक्रेतुकाम अखिल गोपकन्या मुरारी पदार्पित चित्तवृत्त्यः ।
दध्योदकं मोहवसादवोचद् गोविंद दामोदर माधवेति ॥

जिनकी चित्तवृत्ति मुरारिके चरणकमलोंमे लगी हुई है, वे सभी गोपकन्याएँ दूध-दही बेचनेकी इच्छासे घरसे चलीं । उनका मन तो मुरारिके पास था; अतः प्रेमवश सुध-बुध भूल जानेके कारण ‘दही लो दही’ इसके स्थानपर जोर-जोरसे ‘गोविन्द ! दामोदर ! माधव ! आदि पुकारने लगीं ॥३॥

जगधोय दत्तो नवनीत पिण्डः गृहे यशोदा विचिकित्सयानि ।
उवाच सत्यं वद हे मुरारे गोविंद दामोदर माधवेति ॥
जिह्वे रसाग्रे मधुरा प्रिया त्वं सत्यं हितं त्वं परमं वदामि ।
अवर्णयेत मधुराक्षराणि गोविंद दामोदर माधवेति ॥
गोविंद गोविंद हरे मुरारे गोविंद गोविंद मुकुंद कृष्ण ।
गोविंद गोविंद रथांगपाणे गोविंद दामोदर माधवेति ॥
सुखावसाने त्विदमेव सारं दुःखावसाने त्विदमेव गेयम् ।
देहावसाने त्विदमेव जप्यं गोविंद दामोदर माधवेति ॥

सुखके अन्तमें यही सार है, दुःखके अन्तमें यही गाने योग्य है और शरीरका अन्त होनेके समय भी यही मन्त्र जपने योग्य है, कौन-सा मन्त्र ? यही कि ‘हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव !’ ॥

वक्तुं समर्थोपि नवक्ति कश्चित् अहो जनानां व्यसनाभिमुख्यम् ।
जिह्वे पिबस्वमृतमेतदेव गोविंद दामोदर माधवेति ॥

Jai Sri Krishna

Happy Sri Krishna Janmashtami


Shri Krishna Janmashtami :: Thu, 25 August 2016
Janmashtami Celebration at

Shri Krishna Janmbhoomi Mathura/Vrindavan : Thu, 25 August 2016
DWARKADHISH TEMPLE (Gujarat) : Thu, 25 August 2016
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This is the Birthday of Lord Krishna, the eighth Divine Incarnation. It falls on the 8th day of the dark half of the month of Bhadrapada (August-September). This is one of the greatest of all Hindu festivals. Lord Krishna was born at midnight. A twenty-four hour fast is observed on this day, which is broken at midnight.

Temples are decorated for the occasion. Kirtans are sung, bells are rung, the conch is blown, and Sanskrit hymns are recited in praise of Lord Krishna. At Mathura, the birthplace of Lord Krishna, special spiritual gatherings are organised at this time. Pilgrims from all over India attend these festive gatherings. The Lord appeared when the moon entered the house of Vrishabha at the constellation of the star Rohini, on Wednesday, the 8th day of the second fortnight of the month of Sravana, which corresponds to the month of Bhadrapada Krishnapaksha according to the Barhaspatyamana, in the year of Visvavasu, 5,172 years ago (from 1945), which means 3227 B.C.

During the daylight hours of the astami one should observe the vow of fasting in the association of devotees, and staying awake at night, at midnight one should perform the abhiseka according the vidhi just described, accompanied by joyful singing and dancing.

The next day one should celebrate the Lord’s appearance with great festivity and respect mahaprasadam with the vaisnavas. One who performs worship of th Lord on Janmastami day according to the method stated above, and with the mood of service of the inhabitants of Vraja, will certainly gain the affection of Krishna. Having gained that affection he will be blessed with deep love of Krishna (prema) and will directly serve the Lord in Vrindavana eternally.

Baby Krishna 

Shri Krishna Janmastami 
जन्माष्टमी की महिमा

According to Ved-Puran

ब्रह्मपुराण का कथन है कि कलियुग में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी में अट्ठाइसवें युग में देवकी के पुत्र श्रीकृष्ण उत्पन्न हुए थे।

स्कन्दपुराण के मतानुसार जो भी व्यक्ति जानकर भी कृष्ण जन्माष्टमी व्रत को नहीं करता, वह मनुष्य जंगल में सर्प और व्याघ्र होता है।

वसिष्ठ संहिता का मत है- यदि अष्टमी तथा रोहिणी इन दोनों का योग अहोरात्र में असम्पूर्ण भी हो तो मुहूर्त मात्र में भी अहोरात्र के योग में उपवास करना चाहिए।

मदन रत्न में स्कन्द पुराण का वचन है कि जो उत्तम पुरुष है। वे निश्चित रूप से जन्माष्टमी व्रत को इस लोक में करते हैं। उनके पास सदैव स्थिर लक्ष्मी होती है। इस व्रत के करने के प्रभाव से उनके समस्त कार्य सिद्ध होते हैं।

विष्णु धर्म के अनुसार आधी रात के समय रोहिणी में जब कृष्णाष्टमी हो तो उसमें कृष्ण का अर्चन और पूजन करने से तीन जन्मों के पापों का नाश होता है।

|| Happy Janmashtami ||

|| Jai Shree Krishna ||

Shri Krishna Janmashtami Vrat : Thu, 25 August 2016
Sri Krishna Janmashtami Pujan Vidhi and Aarti Shree Kunj Bihari Ki

इस दिन केले के खंभे , आम अथवा अशोक के पल्लव आदि से घरका द्वार सजाया जाता है । दरवाजे पर मंगल कलश एवं मूसल स्थापित करे । रात्रिमें भगवान् श्रीकृष्ण की मूर्ति अथवा शालग्रामजी को विधिपूर्वक पंचामृत से स्नान कराकर षोडशोपचार से विष्णु पूजन करना चाहिऐ ।

‘ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ‘ – इस मन्त्र से पूजन कर तथा वस्त्रालंकर आदि से सुसज्जित करके भगवान् को सुन्दर सजे हुए हिंडोले में प्रतिष्ठित करे । धूप, दीप और अन्नरहित नैवेध तथा प्रसूति के समय सेवन होने वाले सुस्वाद मिष्ठान , जयेकेदार नमकीन पदार्थो एवं उस समय उत्तपन्न होने वाले विभिन्न प्रकार के फल, पुष्पों और नारियल , छुहारे , अनार बिजौरे, पंजीरी, नारियल के मिष्ठान तथा नाना प्रकार के मेवे का प्रसाद सजाकर श्रीभगवान् को अर्पण करे ।

दिन में भगवान् की मूर्ति के सामने बैठकर कीर्तन करे तथा भगवान् का गुणगान करे और रात्रिको बारह बजे गर्भ से जन्म लेने के प्रतीक स्वरुप खीरा फोड़कर भगवान् का जन्म कराये एवं जन्मोत्सव मनाये । जन्मोत्सव के पश्चात कर्पूरादी प्रज्वलित कर समवेत स्वर से भगवान् की आरती स्तुति करे, पश्चात प्रसाद वितरण करे।


आरती कुंजबिहारी की


आरती कुंजबिहारी की श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।

गले में बैजन्तीमाला बजावैं मुरलि मधुर बाला॥ 
श्रवण में कुंडल झलकाता नंद के आनंद नन्दलाला की ।। आरती…।। 

गगन सम अंगकान्ति काली राधिका चमक रही आली।
लतन में ठाढ़े बनमाली भ्रमर-सी अलक कस्तूरी तिलक।
चंद्र-सी झलक ललित छबि श्यामा प्यारी ।। आरती…।।


कनकमय मोर मुकुट बिलसैं देवता दरसन को तरसैं।
गगन से सुमन राशि बरसैं बजै मुरचंग मधुर मृदंग।

ग्वालिनी संग-अतुल रति गोपकुमारी की ।। आरती…।।


जहाँ से प्रगट भई गंगा कलुष कलिहारिणी गंगा।
स्मरण से होत मोहभंगा बसी शिव शीश जटा के बीच।

हरै अघ-कीच चरण छवि श्री बनवारी की ।। आरती…।।


चमकती उज्ज्वल तट रेनू बज रही बृंदावन बेनू।
चहुँ दिशि गोपी ग्वालधेनु हँसत मृदुमन्द चाँदनी चंद।

कटत भवफन्द टेर सुनु दीन भिखारी की ।। आरती…।।



|| Jai Shree Radhey ||
Damodar Lila
Sri Krishna Janmashtami Vrat 2016
Thu, 25 August 2016

Jai Shri Krishna


श्रावणमासके शुक्लपक्षकी पंचमी तिथिको नागपंचमी (Nag Panchami - Sunday, 7 August 2016) का त्योहार नागोंको समर्पित है। इस त्योहारपर व्रतपूर्वक नागोंका अर्चन-पूजन होता है। वेद और पुराणोंमें नागोंका उद्गम महर्षि कश्यप और उनकी पत्नी कद्रूसे माना गया है। नागोंका मूलस्थान पाताललोक प्रसिद्ध है।

पुराणोंमें ही नागलोककी राजधानीके रुपमें भोगवतीपुरी विख्यात है। भगवान्‌ विष्णुकी शय्याकी शोभा नागराज शेष बढ़ाते हैं। भगवान्‌ शिव और गणेशजीके अलंकरणमें भी नागोंकी मह्त्त्वपूर्ण भूमिका है। पुराणोंमें भगवान्‌ सूर्यके रथमें द्वादश नागों का उल्लेख मिलता है, जो क्रमश: प्रत्येक मासमें उनके रथ के वाहक बनते हैं। नागदेवता भारतीय संस्कृतिमें देवरुपमें स्वीकार किये गये हैं।

देवी भागवतमें प्रमुख नागोंका नित्य स्मरण किया गया है। हमारे ऋषि-मुनियोंनें नागोपासनामें अनेक व्रत-पूजनका विधान किया है। श्रावणमासके शुक्ल पक्षकी पंचमी नागोंको अत्यन्त आनन्द देनेवाली है -‘नागानामानन्दकरी’ पंचमी तिथिको नागपूजामें उनको गो-दुग्धसे स्नान करानेका विधान है। कहा जाता है कि एक बार मातृ-शापसे नागलोक जलने लगा । इस दाहपीडाकी निवृत्तिके लिये (नागपंचमीको) गो-दुग्धस्नान जहाँ नागोंको शीतलता प्रदान करता है, वहाँ भक्तोंको सर्पभय से मुक्ति भी देता है।


ब्रह्माजीने पंचमी तिथिको नागोंको पाण्डववंशके राजा जनमेजय द्वारा किये जानेवाले नागयज्ञसे यायावरवंशमें उत्त्पन्न तपस्वी जरत्कारु के पुत्र आस्तीक द्वारा रक्षाका वरदान दिया था। तथा इसी तिथिपर आस्तीकमुनिने नागोंका परिरक्षण किया था । अत: नागपंचमीका यह पर्व ऎतिहासिक तथा सांस्कृतिक दृष्टिसे महत्त्वपूर्ण है ।

श्रावनमासके शुक्लपक्षकी पंचमीको नागपूजाका विधान है। व्रतके साथ एक बार भोजन करने का नियम है। पूजामें पृथ्वीपर नागोंका चित्राड्कन किया जाता है। स्वर्ण, रजत, काष्ठ या मृत्तिकासे नाग बनाकर पुष्प, गुन्ध, धूप-दीप एवं विविध नैवेधोंसे नागोंका पूजन होता है।

निज गृहके द्वारमें दोनों ओर गोबरके सर्प बनाकर उनका दधि, दूर्वा, कुशा, गन्ध, अक्षत, पुष्प, मोदक और मालपुआ आदिसे पूजा करने और ब्राह्मणोंको भोजन कराकर एकभुक्त व्रत करनेसे घरमें सर्पोंका भय नहीं होता है।

On Nag Panchami, the women draw figures of snakes on the walls of their houses using a mixture of black powder, cow dung and milk.

Then offerings of milk, ghee, water and rice are made. It is believed that in reward for this worship, snakes will never bite any member of the family.

The snake deity worshipped on Naag Panchami is the goddess Manasa.

Nag Panchami (Shravan Shukla Paksha) :  Sunday, 7 August 2016 (All India)

On Nag Panchami, the women draw figures of snakes on the walls of their houses using a mixture of black powder, cow dung and milk. Then offerings of milk, ghee, water and rice are made. It is believed that in reward for this worship, snakes will never bite any member of the family.
The snake deity worshipped on Naag Panchami is the Goddess Manasa.

Naag Puja and Mantra


 There is also a sanskrit mantra to offer pray to Nine Prime Nag Devta



Teej Festival

Hariyali (Singhara) Teej:  Friday 5 August 2016

Hariyali Teej (Singhara Teej) is one of the most widely celebrated festivals of Rajasthan & also of some part Central & North India. Swings, traditional songs and dancing are the unique features of Teej celebrations in Rajasthan. Women perform traditional folk dance dressed in green colored clothes and sing beautiful Teej songs while enjoying their sway on swings bedecked with flowers.

On this day, women and young girls wear their best clothes and adorn themselves with fine jewelry. They gather at a nearby temple or a common place and offers prayers to Goddess Parvati for well-being of their husband.

Swings are hung from trees and decorated with fragrant flowers. Women both married and unmarried love to swing on these swings to celebrate the 'sawan festival'.

श्रावनमासके शुक्लपक्षकी तृतीयाको हरियाली तीज कहते हैं । इस दिन महिलाएँ भवानी-पार्वतीका पूजन करती हैं।

राजस्थानकी परम्परामें इस माह लडकियोंको ससुरालसे पितृगृह बुला लिया जाता है। जिस लडकीके विवाहके पश्चात्‌ पहला सावन आया हो, उसे ससुरालमें नहीं रखा जाता ।

सावनमें सुन्दर-से-सुन्दर पकवान्न पकाकर बेटियोंको सिंघारा भेजा जाता है । इस माहमें हिंडोलेपर झूला जाता है।

इस तीजपर मेहँदी लगानेका विशेष महत्व है, जो सुहागका चिह्न माना जाता है। कहा जाता है कि इस दिन गौरा विरहाग्निमें तपकर शिवसे मिली थीं।

देवी सुरेश्वरी भगवती गंगे,
त्रिभुवन तारिणी तरलतरंगे,
शंकरमौलविहारिणी विमले,
मममतिरास्तम तवपद कमले ।
हर हर गंगे, नमामी गंगे |

Ganga Dusshera ( गंगा दशहरा)

Tue, 14 June, 2016

Those countries and those points of the compass that are destitute of the sacred waters of Ganga are like nights without the moon or like trees without flowers. Verily, a world without Ganga is like the different orders and modes of life when they are destitute of righteousness or like sacrifices without Soma. Without doubt, countries and points of the compass that are without Ganga are like the firmament without the Sun, or the Earth without mountains, or the welkin without air. The entire body of creatures in the three worlds, if served with the auspicious waters of Ganga, derive a pleasure, the like of which they are incapable of deriving from any other source.

As snakes become deprived of their poison at the very sight of Garuda (eagle), even so one becomes cleansed of all one’s sins at the very sight of the sacred stream of Ganga. They that are without good name and that are addicted to deeds of sinfulness, have Ganga for their fame, their protection, their means of rescue, their refuge or cover. Many wretches among men, who become afflicted with diverse sins of a heinous nature, when they are about to sink into hell, are rescued by Ganga in the next world (if, notwithstanding their sins, they seek the aid of Ganga in their after-years).

नमामि गंगे तव पादपंकजं सुरासुरैर्वन्दितदिव्यरूपम । 
भुक्तिं च मुक्तिं च ददासि नित्यं भावानुसारेण सदा नराणाम ॥
हे माता गंगे ! देवता‌ओं और राक्षसों द्वारा वंदित आपके दिव्य चरणकमलों को मैं नमस्कार करता हूँ, जो मनुष्यों को नित्य ही उनके भावानुसार भक्ति और मुक्ति प्रदान करते हैं।’
They, O foremost of intelligent men, who plunge every day in the sacred waters of Ganga, become the equals of great Munis and the very deities with Vasva at their head. Those wretches among men that are destitute of humility or modesty of behaviour and that are exceedingly sinful, become righteous and good, O Brahmana, by betaking themselves to the side of Ganga. As Amrita (drink that confers immortality) is to the deities, a Swadha (oblation offered to Pitris during sacred fire ceremony) is to the Pitris, as Sudha is to the Nagas, even so is Ganga water to human beings.

Those who, although possessed of the physical ability, do not seek to have a sight of the auspicious Ganga of sacred current, are, without doubt, to be likened to persons afflicted with congenital blindness or those that are dead or those that are destitute of the power of locomotion through palsy or lameness. What man is there that would not reverence this sacred stream that is adored by great Rishis conversant with the Present, the Past, and the Future, as also by the very deities with Indra at their head. What man is there that would not seek the protection of Ganga whose protection is sought for by forest recluses and householders, and by Yatis and Brahmacharins alike?

That man who dwells by the side of Ganga up to the time of his death, adoring her with reverence, becomes freed from the fear of every kind of calamity, of sin, and of kings.


Creatures that live on Earth, in the welkin, or in heaven- indeed, even beings that are very superior- should always bathe in Ganga. Verily, this is the foremost of all duties with those that are righteous. The fame of Ganga for sanctity has spread over the entire universe, since she bore all the sons of Sagara, who had been reduced to ashes, from here to heaven.


Ganga is the daughter of Himavat, the spouse of Hara, and the ornament of both heaven and earth. She is the bestower of everything auspicious, and is competent to confer the six well-known attributes beginning with lordship or puissance. Verily, O king, Ganga is the one object of great sanctity in the three worlds and confers merit upon all. Truly, monarch, Ganga is Righteousness in liquefied form. She is energy also running in a liquid form over the earth. She is endued with the splendour of puissance that belongs to the ghee that is poured with Mantras on the sacrificial fire. She is always adorned with large waves as also with Brahmanas who may at all times be seen performing their ablutions in her waters. Falling from heaven, she was held by Siva on his head. The very mother of the heavens, she has sprung from the highest mountain for running over the plains and conferring the most precious benefits on all creatures of the earth. She is the highest cause of all things; she is perfectly stainless. She is as subtle as Brahma.

Yudhishthira & Bhishma Pitahmah Samvaad

From The Mahabharata
Anusasana Parva, Section XXVI

Nirjala Ekadashi : Thu, 16 June 2016

निर्जला एकादशी का व्रत आयु, आरोग्यवृद्धि एवं पुण्य लाभ की दृष्टि से विशेष माना गया है।

व्यासजी के अनुसार अगर एक वर्ष की पच्चीस एकादशी न की जा सके तो केवल निर्जला एकादशी का व्रत करने से ही पुण्य लाभ हो जाता है।

Without drinking even water, one should fast on the Ekadasi that occurs during the light fortnight of the month of Jyeshtha (May-June) when the sun travels in the sign of Taurus (Vrishabh) and Gemini (Mithun), According to learned personalities, on this day one may bathe and perform Achamana for pratiprokshana purification. But while performing Achamana one may drink only that amount of water equal to a drop of gold, or that amount it takes to immerse a single mustard seed. Only this amount of water should be placed in the right palm for sipping, which one should form to resemble a cow's ear. If one drinks more water than this, he might as well have drunk wine - despite the soaring heat of summer (in the northern hemisphere and cold in the southern hemisphere).

Pray to the Supreme Personality of Godhead, Lord Sri Krishna in this way making your sankalpa declaration, `Oh Lord of all the devas (demigods), Oh Supreme Personality of Godhead, today I shall observe Ekadashi without taking any water. Oh unlimited Anantadev, I shall break fast on the next day, Dwadashi.' Thereafter, to remove all his sins, the devotee should honour this Ekadashi fast with full faith in the Lord and with full control over his senses. Whether his sins are equal in volume to Mount Sumeru or to MandarAchala Hill, if he or she observes this Ekadashi, the sins that have been accumulated all become nullified and are burned to ashes. Such is the great power of this Ekadashi.

One must certainly not eat anything, for if he does so he breaks his fast. This rigid fast is in effect from sunrise on the Ekadashi day to sunrise on the Dwadashi day. If a person endeavours to observe this great fast very strictly, he easily achieves the result of observing all twenty-five other Ekadashi fasts throughout the entire year.

On Dwadashi the devotee should bathe early in the morning. Then, according to the prescribed rules, guidelines and regulative injunctions, and of course depending on his ability, he should give some gold and water to worthy brahmanas. Finally, he should cheerfully honour prasadam with a brahmana.

Although a person should also give water and cows in charity during this Ekadashi, if for some reason or other he cannot, then he should give a qualified brahman some cloth or a pot filled with water. Indeed, the merit achieved by giving water alone equals that gained by giving gold ten million times a day.

One who on this day gives a brahmana a waterpot, an umbrella, or shoes surely goes to the heavenly planets. Indeed, he who simply hears these glories also attains to the transcendental abode of the Supreme Lord, Shri Vishnu. Whoever performs the Shraddha ceremony to the forefathers on the dark-moon day called amavasya, particularly if it occurs at the time of a solar eclipse undoubtedly achieves great merit. But this same merit is achieved by him who simply hears this sacred narration - so powerful and so dear to the Lord is this Ekadashi.

Anyone who does not fast on this particular Ekadashi (Nirajala Ekadashi), they should be understood to be sinful, corrupted and suicidal person without a doubt.

Remember, whosoever eats any grains on Ekadashi becomes contaminated by sin and verily eats only sin. In effect, he has already become a dog-eater, and after death he suffers a hellish existence. But he who observes this sacred Jyeshtha-shukla Ekadashi and gives something in charity certainly achieves liberation from the cycle of repeated birth and death and attains to the supreme abode. Observing this Ekadashi, which is merged with Dwadashi, frees one from the horrible sin of killing a brahmana, drinking liquor and wine, becoming envious of one's spiritual master and ignoring his instructions, and continually telling lies.


- Vyasadeva speaks to Bhimasena

(from Brahma-Vaivarta Purana & Padma Purana)

निर्जला एकादशी व्रत कथा

युधिष्ठिर ने कहा : जनार्दन ! ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी पड़ती हो, कृपया उसका वर्णन कीजिये ।

भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! इसका वर्णन परम धर्मात्मा सत्यवतीनन्दन व्यासजी करेंगे, क्योंकि ये सम्पूर्ण शास्त्रों के तत्त्वज्ञ और वेद वेदांगों के पारंगत विद्वान हैं ।

तब वेदव्यासजी कहने लगे : दोनों ही पक्षों की एकादशियों के दिन भोजन न करे । द्वादशी के दिन स्नान आदि से पवित्र हो फूलों से भगवान केशव की पूजा करे । फिर नित्य कर्म समाप्त होने के पश्चात् पहले ब्राह्मणों को भोजन देकर अन्त में स्वयं भोजन करे । राजन् ! जननाशौच और मरणाशौच में भी एकादशी को भोजन नहीं करना चाहिए ।

यह सुनकर भीमसेन बोले : परम बुद्धिमान पितामह ! मेरी उत्तम बात सुनिये । राजा युधिष्ठिर, माता कुन्ती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव ये एकादशी को कभी भोजन नहीं करते तथा मुझसे भी हमेशा यही कहते हैं कि : ‘भीमसेन ! तुम भी एकादशी को न खाया करो…’ किन्तु मैं उन लोगों से यही कहता हूँ कि मुझसे भूख नहीं सही जायेगी ।

भीमसेन की बात सुनकर व्यासजी ने कहा : यदि तुम्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति अभीष्ट है और नरक को दूषित समझते हो तो दोनों पक्षों की एकादशीयों के दिन भोजन न करना ।

भीमसेन बोले : महाबुद्धिमान पितामह ! मैं आपके सामने सच्ची बात कहता हूँ । एक बार भोजन करके भी मुझसे व्रत नहीं किया जा सकता, फिर उपवास करके तो मैं रह ही कैसे सकता हूँ? मेरे उदर में वृक नामक अग्नि सदा प्रज्वलित रहती है, अत: जब मैं बहुत अधिक खाता हूँ, तभी यह शांत होती है । इसलिए महामुने ! मैं वर्षभर में केवल एक ही उपवास कर सकता हूँ । जिससे स्वर्ग की प्राप्ति सुलभ हो तथा जिसके करने से मैं कल्याण का भागी हो सकूँ, ऐसा कोई एक व्रत निश्चय करके बताइये । मैं उसका यथोचित रुप से पालन करुँगा ।

व्यासजी ने कहा : भीम ! ज्येष्ठ मास में सूर्य वृष राशि पर हो या मिथुन राशि पर, शुक्लपक्ष में जो एकादशी हो, उसका यत्नपूर्वक निर्जल व्रत करो । केवल कुल्ला या आचमन करने के लिए मुख में जल डाल सकते हो, उसको छोड़कर किसी प्रकार का जल विद्वान पुरुष मुख में न डाले, अन्यथा व्रत भंग हो जाता है । एकादशी को सूर्यौदय से लेकर दूसरे दिन के सूर्यौदय तक मनुष्य जल का त्याग करे तो यह व्रत पूर्ण होता है । तदनन्तर द्वादशी को प्रभातकाल में स्नान करके ब्राह्मणों को विधिपूर्वक जल और सुवर्ण का दान करे । इस प्रकार सब कार्य पूरा करके जितेन्द्रिय पुरुष ब्राह्मणों के साथ भोजन करे । वर्षभर में जितनी एकादशीयाँ होती हैं, उन सबका फल निर्जला एकादशी के सेवन से मनुष्य प्राप्त कर लेता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है । शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान केशव ने मुझसे कहा था कि: ‘यदि मानव सबको छोड़कर एकमात्र मेरी शरण में आ जाय और एकादशी को निराहार रहे तो वह सब पापों से छूट जाता है ।’

एकादशी व्रत करनेवाले पुरुष के पास विशालकाय, विकराल आकृति और काले रंगवाले दण्ड पाशधारी भयंकर यमदूत नहीं जाते । अंतकाल में पीताम्बरधारी, सौम्य स्वभाववाले, हाथ में सुदर्शन धारण करनेवाले और मन के समान वेगशाली विष्णुदूत आखिर इस वैष्णव पुरुष को भगवान विष्णु के धाम में ले जाते हैं । अत: निर्जला एकादशी को पूर्ण यत्न करके उपवास और श्रीहरि का पूजन करो । स्त्री हो या पुरुष, यदि उसने मेरु पर्वत के बराबर भी महान पाप किया हो तो वह सब इस एकादशी व्रत के प्रभाव से भस्म हो जाता है । जो मनुष्य उस दिन जल के नियम का पालन करता है, वह पुण्य का भागी होता है । उसे एक एक प्रहर में कोटि कोटि स्वर्णमुद्रा दान करने का फल प्राप्त होता सुना गया है । मनुष्य निर्जला एकादशी के दिन स्नान, दान, जप, होम आदि जो कुछ भी करता है, वह सब अक्षय होता है, यह भगवान श्रीकृष्ण का कथन है । निर्जला एकादशी को विधिपूर्वक उत्तम रीति से उपवास करके मानव वैष्णवपद को प्राप्त कर लेता है । जो मनुष्य एकादशी के दिन अन्न खाता है, वह पाप का भोजन करता है । इस लोक में वह चाण्डाल के समान है और मरने पर दुर्गति को प्राप्त होता है ।

जो ज्येष्ठ के शुक्लपक्ष में एकादशी को उपवास करके दान करेंगे, वे परम पद को प्राप्त होंगे । जिन्होंने एकादशी को उपवास किया है, वे ब्रह्महत्यारे, शराबी, चोर तथा गुरुद्रोही होने पर भी सब पातकों से मुक्त हो जाते हैं ।

कुन्तीनन्दन ! ‘निर्जला एकादशी’ के दिन श्रद्धालु स्त्री पुरुषों के लिए जो विशेष दान और कर्त्तव्य विहित हैं, उन्हें सुनो: उस दिन जल में शयन करनेवाले भगवान विष्णु का पूजन और जलमयी धेनु का दान करना चाहिए अथवा प्रत्यक्ष धेनु या घृतमयी धेनु का दान उचित है । पर्याप्त दक्षिणा और भाँति भाँति के मिष्ठान्नों द्वारा यत्नपूर्वक ब्राह्मणों को सन्तुष्ट करना चाहिए । ऐसा करने से ब्राह्मण अवश्य संतुष्ट होते हैं और उनके संतुष्ट होने पर श्रीहरि मोक्ष प्रदान करते हैं । जिन्होंने शम, दम, और दान में प्रवृत हो श्रीहरि की पूजा और रात्रि में जागरण करते हुए इस ‘निर्जला एकादशी’ का व्रत किया है, उन्होंने अपने साथ ही बीती हुई सौ पीढ़ियों को और आनेवाली सौ पीढ़ियों को भगवान वासुदेव के परम धाम में पहुँचा दिया है । निर्जला एकादशी के दिन अन्न, वस्त्र, गौ, जल, शैय्या, सुन्दर आसन, कमण्डलु तथा छाता दान करने चाहिए । जो श्रेष्ठ तथा सुपात्र ब्राह्मण को जूता दान करता है, वह सोने के विमान पर बैठकर स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है । जो इस एकादशी की महिमा को भक्तिपूर्वक सुनता अथवा उसका वर्णन करता है, वह स्वर्गलोक में जाता है । चतुर्दशीयुक्त अमावस्या को सूर्यग्रहण के समय श्राद्ध करके मनुष्य जिस फल को प्राप्त करता है, वही फल इसके श्रवण से भी प्राप्त होता है । पहले दन्तधावन करके यह नियम लेना चाहिए कि : ‘मैं भगवान केशव की प्रसन्न्ता के लिए एकादशी को निराहार रहकर आचमन के सिवा दूसरे जल का भी त्याग करुँगा ।’ द्वादशी को देवेश्वर भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए । गन्ध, धूप, पुष्प और सुन्दर वस्त्र से विधिपूर्वक पूजन करके जल के घड़े के दान का संकल्प करते हुए निम्नांकित मंत्र का उच्चारण करे :
देवदेव ह्रषीकेश संसारार्णवतारक । 

उदकुम्भप्रदानेन नय मां परमां गतिम्॥

‘संसारसागर से तारनेवाले हे देवदेव ह्रषीकेश ! इस जल के घड़े का दान करने से आप मुझे परम गति की प्राप्ति कराइये ।’

भीमसेन ! ज्येष्ठ मास में शुक्लपक्ष की जो शुभ एकादशी होती है, उसका निर्जल व्रत करना चाहिए । उस दिन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को शक्कर के साथ जल के घड़े दान करने चाहिए । ऐसा करने से मनुष्य भगवान विष्णु के समीप पहुँचकर आनन्द का अनुभव करता है । तत्पश्चात् द्वादशी को ब्राह्मण भोजन कराने के बाद स्वयं भोजन करे । जो इस प्रकार पूर्ण रुप से पापनाशिनी एकादशी का व्रत करता है, वह सब पापों से मुक्त हो आनंदमय पद को प्राप्त होता है ।

यह सुनकर भीमसेन ने भी इस शुभ एकादशी का व्रत आरम्भ कर दिया । तबसे यह लोक मे ‘पाण्डव द्वादशी’ के नाम से विख्यात हुई । इस व्रत को भीमसेनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है ।

Beginning on the thirteenth lunar day in shuklapaksha, when the nakshatra Bhadrapada is in the sky, one fasts for three days and recounts the story of Savitri and Satyavana. (This story can be found in other Puranas and in the Mahabharata. Savitri's husband Satyavana had died. Savitri convinced Yama of her devotion and persuaded the god of death to bring her dead husband back to life) .

Newly married women visit a nearby Vat tree and worship it by tying red threads of love around it. They offer flowers and sweets to the tree. When the moon rises full and resplendent on the horizon, special feasts are shared by families.

Vat Savitri Vrat (Bad Mavas): Sat, 4 June 2016

Vat Savitri Vrat (Purnima) : Sun, 19 June 2016

वट की परिक्रमा करते समय एक सौ आठ बार या यथा शक्ति सुत लपेटा जाता है। ‘नमो वैवस्वताय’ इस मन्त्रसे वटवृक्षकी प्रदक्षिणा करनी चाहिये। सावित्रीको अर्घ्य देना चाहिये और वटवृक्षका सिंचन करते हुए अपने सौभाग्य की प्रार्थना करनी चाहिये। चने पर रुपया रखकर बायनेके रुपमें अपनी सासको देकर आशीर्वाद लिया जाता है। सौभाग्य-पिटारी और पुजा सामग्री किसी योग्य ब्राह्मणको दी जाती है।

वट सावित्री व्रत कथा एवं विधान हिंदी में

Vat Savitri Vrat Katha : The story of Savitri & King Satyawan

Savitri, one of the most venerated women of Indian mythology. Savitri was a princess, born by the blessing of the sun god to King Ashwapati. A lustrous woman of great beauty, she was sent to the forest ashrams of sages to look for a suitable bridegroom for herself. Eventually, she met Satyawan, a prince living in the forest because his blind father had been banished from his empire. When Savitri revealed to her parents her determination to marry Satyawan, the court astrologers tried to stop her. They said that the prince's lifeline clearly showed that he would die within a year. Savitri had however, accepted him as her husband and would not be deterred from her resolve. She married him and went to the forest ashram to live with him and his parents.

On the full moon night of jyeshtha, the couple went into the jungle to collect firewood. As Satyawan rested under a Vat tree, Yama, the god of death came to snatch away his life. Savitri, seeing Yama take away her husband's breath, followed, pleading with him to return her husband's life. At each milestone, going from earth to heaven, Yama tried to persuade the determined princess to return home and accept the destiny of her husband as unchangeable. In the face of her resolve to conquer what appeared to be insurmountable obstacles, all his efforts were in vain. Then, to persuade her more effectively, he offered her three boons, excluding the life of her dead husband. Savitri, a woman of great intelligence, couched her requests in such a manner that she got back everything that her family had lost.

First, she asked for the lost sight of her blind father-in-law. Next, she asked for their lost empire and prosperity. And finally she asked for worthy progeny. When Yama had granted her the boon of progeny, she reminded him that his boon could not be fulfilled without Satyawan. Yama, defeated by her strength and faith, had to surrender the life force of Satyawan to her, and bless her with an immortal place in the hearts of her people.
Today, Savitri's power and her tenacity to overcome insurmountable problems remains an inspiration for every woman. She is venerated on the jyeshtha full moon day which is named after her and the tree under which this legend unfolded.

The observance of this vrata guarantees marital harmony.

स्कंद पुराण तथा भविष्योत्तर पुराण के अनुसार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को वट सावित्री व्रत करने का विधान है, वहीं निर्णयामृत आदि के अनुसार ज्येष्ठ मास की अमावस्या को यह व्रत करने की बात कही गई है। तिथियों में भिन्नता होते हुए भी व्रत का उद्देश्य एक ही है सौभाग्य की वृद्धि और पतिव्रत के संस्कारों को आत्मसात करना।

वट देव वृक्ष है। वट वृक्ष के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु तथा अग्रभाग में शिव रहते हैं। देवी सावित्री भी वट वृक्ष में रहती हैं।

वट वृक्ष के नीचे सावित्री ने अपने पति को पुन: जीवित किया था। तब से यह व्रत ‘वट सावित्री’ के नाम से जाना जाता है। इसमें वट वृक्ष की पूजा की जाती है। महिलाएं अखण्ड सौभाग्य एवं परिवार की समृद्धि के लिए यह व्रत करती हैं। व्रत की परिक्रमा करते समय एक सौ आठ बार या यथाशक्ति सूत लपेटा जाता है। साड़ी पर रुपया रखकर बायने के रूप में सास को देकर आशीर्वाद लिया जाता है। महिलाएं सावित्री सत्यवान की कथा सुनती हैं। सावित्री की कथा को सुनने से सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण होते हैं और विपत्तियां दूर होती हैं।

Vat Savitri Vrat (Bad Mavas): Sat, 4 June 2016

Vat Savitri Vrat (Purnima) : Sun, 19 June 2016 

वट सावित्री व्रत कथा

मद्र देश के राजा अश्वपति ने पत्नी सहित सन्तान के लिये सावित्री देवी का विधी पूर्वक व्रत तथा पूजन करके पुत्री होने का वर प्राप्त किया सर्वगुण सम्पन देवी सावित्री ने पुत्री के रूप में अश्वपती के घर कन्या के रूप में जन्म लिया ।

कन्या के युवा होने पर अश्वपती ने अपने मंत्री के साथ सावित्री को अपना पती चुनने के लिये भेज दिया। सावित्री ने अपने मन के अनुकूल वर का चयन कर के लोटी तो उसी दिन देवर्षि नारद उनके यहा पधारे। नारद के पूछने पर सावित्री ने कहा महाराज धुमत्य सेन के पुत्र सत्यवान की कीर्ति सुनकर उन्हें मैंने पति रूप में वरन कर लिया है । नारदजी ने सत्यवान तथा सावित्री के ग्रहों की गणना कर अश्वपती को बधाई दी तथा सत्यवान के गुणों की भुरी भुरी प्रसंसा की और बताया की सवेत्री के बारह वर्ष की आयु होने पर सत्यवान की मृत्य हो जायेगी नारद की बात सुनकर राजा अस्वपती का चहरा मुरझा गया उन्होंने सावित्री से किसी अन्य को अपना पती चुनने की सलहा दी परन्तु सावित्री ने उतर दिया आर्य कन्या होने के नाते जब में सत्यवान का वरन कर चुकी हू तो अब वे चाहे अल्पायु हो या द्रिघायु में किसी अन्य को अपने हृदय में स्थान नही दे सकती ।

सावित्री ने नारदजी से सत्यवान की मुत्यु का समय ज्ञात कर लिया। दोनों को विवाह हो गया। सावित्री अपने श्वसुर परिवार के साथ जंगल में रहने लगी तथा नारदजी द्वारा बताये हुए दिन से तीन दिन पूर्व से ही सावित्री ने उपवास शुरु कर दिया । नारद द्वारा निश्चत तिथी को जब सत्यवान लकड़ी काटने के लिया चला तो सास स्वसुर से आज्ञा लेकर वह भी सत्यवान के साथ चल दी । सत्यवान वन में पहुचकर लकड़ी कटाने के लिये वृक्ष पर चढ़ा। वृक्ष पर चड़ने के बाद उसके सीर में भयंकर पीड़ा होने लगी तो वह नीचे उतरा | सावित्री ने उसे बड के पेड़ के नीचे लिटा कर उसका सिर अपनी गोद पर रख लिया | देखते ही देखते यमराज ने ब्रह्मा के विधान की रूप रेखा सावित्री के सामने स्पस्ट की ओर सत्यवान के प्राणों को लेकर चल दिये (कहीं –कही ऐसा भी उल्लेख मिलता है की वट वृक्ष के नीचे लेटे हुए सत्यवान को सर्प ने डस लिया था ) ।

सावित्री सत्यवान को वट वृक्ष के नीचे ही लिटाकर यमराज के पीछे –पीछे चल दी | पीछे आती हुई सावित्री को यमराज ने उसे लोट जाने का आदेश दिया | इस पर वह बोली महाराज जहां पति वही पत्नी | यही धर्म है, यही मर्यादा है | सावित्री की धर्म निष्टा से प्रसन्न होकर यमराज बोले पति के प्राणों के अतिरिक्त कुछ भी माँग लो | सावित्री ने यमराज से सास –श्वसुर के आखों की ज्योति और द्रिघायु माँगी | यमराज तथास्तु कहकर आगे बढ़ गये | सावित्री भी यमराज का पीछा करती रही ।

यमराज ने अपने पीछे आती सावित्री से वापिस लोट जाने को कहा तो सावित्री बोली पति के बिना नारी के जीवन की कोई सार्थकता नही | यमराज ने सावित्री के पति व्रत धर्म से खुश होकर पुनः वरदान माँगने के लिये कहा इस बार उसने अपने श्वसुर का राज्य वापिस दिलाने की प्राथना की तथास्तु कहकर यमराज आगे चल दिये | सावित्री अब भी यमराज के पीछे चलती रही इस बार सावित्री ने यमराज से सो पुत्रों की माँ बनने का वरदान माँगा | तथास्तु कहकर जब यमराज आगे बढ़े तो सावित्री बोली आपने मुझे सो पुत्रों का वरदान दिया है, पर पति के बिना मै माँ किस प्रकार बन सकती हूँ । अपना यह तीसरा वरदान पूरा कीजिए । सावित्री की धर्मनिष्ठा, ज्ञान, विवेक तथा पतिव्रत धर्म की बात जानकर यमराज ने सत्यवान के प्राणों को अपने पाश से स्वतंत्र कर दिया | सावित्री सत्यवान के प्रणों को लेकर वट वृक्ष के नीचे पहुची जहा सत्यवान का मृत शरीर रखा था | सावित्री ने वट वृक्ष की परिक्रमा की तो सत्यवान जीवित हो उठा |

प्रसन्नचित सावित्री अपने सास –श्वसुर के पास पहुची तो उन्हें नेत्र ज्योती प्राप्त हो गई | इसके बाद उनका खोया हुआ राज्य भी उन्हें मिल गया | आगे चलकर सावित्री सो पुत्रों के माता बनी इस प्रकार चारों दिशायें सावित्री के पतिव्रत धर्म के पालन की कीर्ति से गूंज उठीं |

विधि - विधान

वट की परिक्रमा करते समय एक सौ आठ बार या यथा शक्ति सुत लपेटा जाता है। ‘नमो वैवस्वताय’ इस मन्त्रसे वटवृक्षकी प्रदक्षिणा करनी चाहिये। सावित्रीको अर्घ्य देना चाहिये और वटवृक्षका सिंचन करते हुए अपने सौभाग्य की प्रार्थना करनी चाहिये। चने पर रुपया रखकर बायनेके रुपमें अपनी सासको देकर आशीर्वाद लिया जाता है। सौभाग्य-पिटारी और पुजा सामग्री किसी योग्य ब्राह्मणको दी जाती है।
संकल्प मंत्र -

‘‘मम वैधव्यादि-सकलदोषपरिहारार्थं सत्यवत्सावित्रीप्रीत्यर्थं च वटसावित्री व्रतमहं करिष्ये।’’

पूजा एवं प्रार्थना मंत्र  -

‘‘अवैधव्यं च सौभाग्यं देहि त्वं मम सुव्रते। पुत्रान् पौत्रांश्च सौख्यं च गृहाणाघ्र्यं नमोऽस्तु ते।।’’


Shri Parshuram Jayanti : Sun, 8 May 2016

(Celebrate after 18:55 Hrs IST, 8 May)

वैशाख शुक्ल पक्ष की प्रदोष व्यापिनी तृतीया तिथि में श्रीपरशुराम जयंती मनाई जाती है | - धर्मसिन्धु

भविष्य पुराण के अनुसार वैशाख शुक्ल तृतीया तिथि की रात्रि के प्रथम प्रहर (प्रदोष) में भगवान श्रीपरशुरामजी का अंशावतार हुआ था |

Aakha Teej (Akshaya Tritiya) : Monday, 9 May 2016

सूर्योदय कालीन वैशाख शुक्ल तृतीया  (Tritiya Tithi: until 14: 52 hrs, 9 May 2016)

Akshaya Muhurta - 5.40 am to  12.15 pm (9 May 2016)

Akshaya Tritiya, also known as “Akha Teej”, is traditionally the birthday of Lord Parasurama, the sixth incarnation of Lord Vishnu. People conduct special Pujas on this day, bathe in holy rivers, make a charity, offer barley in a sacred fire, and worship Lord Ganesha & Devi Lakshmi on this day.

Akshaya Tritiya marks the beginning of the Treta Yug. The birthday of Parashurama, the sixth incarnation of Vishnu falls on this day. In the “Puranas”, the holy Hindu scriptures, there is a story that says that on this day of Akshay Tritiya Vedavyas along with Lord Ganesha started writing the great epic Mahabharata. Ganga Devi or Mother Ganges also descended to earth on this day.
This is one of the most auspicious days according to the Hindu calendar. The day on which Moon, Sun and Jupiter unitedly come under Mrigshira Nakshatra is called Akshay Tritiya.

"Akshay Tritiya",the holy day when many perform puja to start a business. According to the  Hindu customs, many choose to perform the pujas for Business,bathe in holy rivers, make a charity, offer barley in a sacred fire, and worship Lord Ganesha & Devi Lakshmi on the holy day of "Akshay Tritiya". It is considered a good time to invest in gold and diamonds. It is believed that whatever is bought on this day, will remain forever.

शास्त्रों में अक्षय तृतीया एवं अक्षय तृतीया का माहात्म्य

# शुभ व पूजनीय कार्य इस दिन होते हैं, जिनसे प्राणियों (मनुष्यों) का जीवन धन्य हो जाता है।

# इस दिन से सतयुग और त्रेतायुग का आरंभ माना जाता है।

# श्री परशुरामजी का अवतरण भी इसी दिन हु‌आ था।

#  इसी दिन श्री बद्रीनारायण के पट खुलते हैं।*

#  नर-नारायण ने भी इसी दिन अवतार लिया था।

#  हयग्रीव का अवतार भी इसी दिन हु‌आ था।

#  वृंदावन के श्री बाँकेबिहारीजी के मंदिर में केवल इसी दिन श्रीविग्रह के चरण-दर्शन होते हैं अन्यथा पूरे वर्ष वस्त्रों से ढँके रहते हैं।

# जो मनुष्य इस दिन गंगा स्नान करता है, उसे पापों से मुक्ति मिलती है।

#  इस दिन परशुरामजी की पूजा करके उन्हें अर्घ्य देने का बड़ा माहात्म्य माना गया है।

#  श्रीकृष्ण ने भी कहा है कि यह तिथि परम पुण्यमय है। इस दिन दोपहर से पूर्व स्नान, जप, तप, होम, स्वाध्याय, पितृ-तर्पण तथा दान आदि करने वाला महाभाग अक्षय पुण्यफल का भागी होता है।
मंगल भवन अमंगल हारी,
दॄवहुसु दशरथ अजिर बिहारि ॥

अगस्त्यसंहिताके अनुसार चैत्र शुक्ल नवमीके दिन पुनर्वसु नक्षत्र, कर्कलग्‍नमें जब सूर्य अन्यान्य पाँच ग्रहोंकी शुभ दृष्टिके साथ मेषराशिपर विराजमान थे, तभी साक्षात्‌ भगवान्‌ श्रीरामका माता कौसल्याके गर्भसे जन्म हुआ।

Ram Navami: Fri, 15 April 2016


चैत्र शुक्ल नवमी का धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व है। आज ही के दिन तेत्रा युग में रघुकुल शिरोमणि महाराज दशरथ एवं महारानी कौशल्या के यहाँ अखिल ब्रम्हांड नायक अखिलेश ने पुत्र के रूप में जन्म लिया था।

दिन के बारह बजे जैसे ही सौंदर्य निकेतन, शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण कि‌ए हु‌ए चतुर्भुजधारी श्रीराम प्रकट हु‌ए तो मानो माता कौशल्या उन्हें देखकर विस्मित हो ग‌ईं। उनके सौंदर्य व तेज को देखकर उनके नेत्र तृप्त नहीं हो रहे थे।
Ram Navami is commemorated in Hindu households by puja (prayer). The items necessary for the puja are roli, aipun, rice, water, flowers, a bell and a conch. After that, the youngest female member of the family applies teeka to all the members of the family. Everyone participates in the puja by first sprinkling the water, roli, and aipun on the Gods, and then showering handfuls of rice on the deities. Then everybody stands up to perform the aarti, at the end of which ganga jal or plain water is sprinkled over the gathering. The singing of bhajans goes on for the entire puja. Finally, the prasad is distributed among all the people who have gathered for worship.

श्रीराम के जन्मोत्सव को देखकर देवलोक भी अवध के सामने फीका लग रहा था। देवता, ऋषि, किन्नार, चारण सभी जन्मोत्सव में शामिल होकर आनंद उठा रहे थे। आज भी हम प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ल नवमी को राम जन्मोत्सव मनाते हैं और राममय होकर कीर्तन, भजन, कथा आदि में रम जाते हैं।

रामजन्म के कारण ही चैत्र शुक्ल नवमी को रामनवमी कहा जाता है। रामनवमी के दिन ही गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना का श्रीगणेश किया था।

उस दिन जो कोई व्यक्ति दिनभर उपवास और रातभर जागरणका व्रत रखकर भगवान्‌ श्रीरामकी पूजा करता है, तथा अपनी आर्थिक स्थितिके अनुसार दान-पुण्य करता है, वह अनेक जन्मोंके पापोंको भस्म करनेमें समर्थ होता है।