॥ श्री गणेशाय नमः ॥
संपादकीय निवेदन
यह श्री गणेशजी की प्रमुख प्रचलित आरतियों का चयनित श्रद्धापूर्ण संग्रह है। घर, मंदिर अथवा गणेशोत्सव की अपनी परंपरा के अनुसार इनमें से एक या अधिक आरतियाँ गाई जा सकती हैं। इसे सभी क्षेत्रों की अंतिम अथवा पूर्ण आरती-सूची नहीं माना जाना चाहिए।
आरती के पाठ में प्रदेश, मंदिर, मौखिक गायन और मुद्रित आरती-पुस्तिकाओं के अनुसार शब्द, वर्तनी तथा पदक्रम के छोटे भेद मिल सकते हैं। नीचे लोकप्रचलित पाठों के आधार पर संपादित पाठ प्रस्तुत है; अपनी पारिवारिक अथवा मंदिर-परंपरा का मान्य पाठ भी श्रद्धापूर्वक अपनाया जा सकता है।
आरती की सामान्य रीति
पूजा अथवा नैवेद्य के बाद श्रद्धापूर्वक दीप घुमाते हुए आरती गाई जा सकती है। आरतियों का क्रम, उनकी संख्या और पूजा-विधि परिवार, मंदिर तथा क्षेत्र के अनुसार भिन्न हो सकती है; किसी एक क्रम को सार्वभौम नियम न मानें।
१. श्री गणेश आरती — जय गणेश जय गणेश देवा
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
एकदंत दयावंत, चार भुजाधारी।
माथे सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी॥
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
पान चढ़े, फल चढ़े, और चढ़े मेवा।
लड्डुअन का भोग लगे, संत करें सेवा॥
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
अंधन को आँख देत, कोढ़िन को काया।
बाँझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
हार चढ़े, फूल चढ़े, और चढ़े मेवा।
सुरदास शरण आए, सफल कीजे सेवा॥
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
परंपरा और पाठांतर: यह आरती हिंदीभाषी क्षेत्रों सहित भारत के अनेक भागों में व्यापक रूप से गाई जाती है। “मूसे की सवारी” तथा अंतिम पद के शब्दों में स्थानीय और मुद्रित पाठांतर मिलते हैं।
पाठ-आधार: लोकप्रचलित आरती-पुस्तिका और गृह-पूजा परंपरा में प्रचलित रूप; प्रकाशन से पहले किसी विश्वसनीय संपादित आरती-पुस्तिका से अंतिम पाठ-मिलान अपेक्षित है।
२. श्री गणपति आरती — सुखकर्ता दुःखहर्ता
सुखकर्ता दुःखहर्ता, वार्ता विघ्नाची।
नुरवी पुरवी प्रेम कृपा जयाची।
सर्वांगी सुंदर उटी शेंदुराची।
कंठी झळके माळ मुक्ताफळांची॥
जय देव जय देव, जय मंगलमूर्ति।
दर्शनमात्रे मनकामना पूर्ती॥
रत्नखचित फरा तुज गौरीकुमरा।
चंदनाची उटी कुंकुमकेशरा।
हिरेजडित मुकुट शोभतो बरा।
रुणझुणती नूपुरे चरणी घागरिया॥
जय देव जय देव, जय मंगलमूर्ति।
दर्शनमात्रे मनकामना पूर्ती॥
लंबोदर पीतांबर फणिवरबंधना।
सरळ सोंड वक्रतुंड त्रिनयना।
दास रामाचा वाट पाहे सदना।
संकटी पावावे, निर्वाणी रक्षावे, सुरवरवंदना॥
जय देव जय देव, जय मंगलमूर्ति।
दर्शनमात्रे मनकामना पूर्ती॥
परंपरा और पाठांतर: यह महाराष्ट्र की अत्यंत प्रचलित मराठी गणपति आरती है। लोकपरंपरा में इसका श्रेय समर्थ रामदास को दिया जाता है; इसे निश्चित ऐतिहासिक रचनाकार-निर्णय के रूप में नहीं प्रस्तुत किया जा रहा है। वर्तनी और कुछ पदों में प्रचलित पाठ-भेद मिलते हैं।
पाठ-आधार: महाराष्ट्र की आरती-पुस्तिका और मंदिर-परंपरा में प्रचलित रूप; प्रकाशन से पहले विश्वसनीय संपादित मराठी पाठ से वर्तनी तथा पदक्रम का अंतिम मिलान अपेक्षित है।
३. श्री गणराज आरती — शेंदूर लाल चढ़ायो
शेंदूर लाल चढ़ायो, अच्छा गजमुख को।
दोंदिल लाल बिराजे, सुत गौरीहर को।
हाथ लिए गुड़-लड्डू, साईं सुरवर को।
महिमा कहे न जाय, लागत हूँ पद को॥
जय देव जय देव, जय जय श्री गणराज।
विद्या सुखदाता, धन्य तुम्हारो दर्शन।
मेरा मन रमता, जय देव जय देव॥
अष्ट सिद्धि दासी, संकट को बैरी।
विघ्नविनाशन मंगलमूरत अधिकारी।
कोटि सूरज प्रकाश, ऐसी छवि तेरी।
गंडस्थल मदमस्तक, झूले शशिबिहारी॥
जय देव जय देव, जय जय श्री गणराज।
विद्या सुखदाता, धन्य तुम्हारो दर्शन।
मेरा मन रमता, जय देव जय देव॥
भाव भगत से कोई शरणागत आवे।
संतति संपति सबही भरपूर पावे।
ऐसे तुम महाराज, मोको अति भावे।
गोसावीनंदन निशिदिन गुण गावे॥
जय देव जय देव, जय जय श्री गणराज।
विद्या सुखदाता, धन्य तुम्हारो दर्शन।
मेरा मन रमता, जय देव जय देव॥
परंपरा और पाठांतर: यह आरती महाराष्ट्र की गणेश-पूजा परंपरा में विशेष रूप से गाई जाती है और अनेक स्थानों पर “सुखकर्ता दुःखहर्ता” के साथ गाई जाती है। इसके शब्दों और पदक्रम में अलग-अलग आरती-पुस्तिकाओं में भेद मिलते हैं। “गोसावीनंदन” इस पाठ में आया नाम है; इसकी निश्चित ऐतिहासिक पहचान यहां स्थापित नहीं की जा रही है।
पाठ-आधार: महाराष्ट्र की गणेश-पूजा और आरती-पुस्तिका परंपरा में प्रचलित रूप; प्रकाशन से पहले विश्वसनीय संपादित पाठ से पंक्तियों और पदक्रम का अंतिम मिलान अपेक्षित है।
भक्तिपरक फल-वर्णन के बारे में
इन आरतियों में मनोकामना, संकट-निवारण, आरोग्य, संतान अथवा संपत्ति से संबंधित पंक्तियाँ पारंपरिक भक्तिकाव्य की अभिव्यक्तियाँ हैं। इन्हें निश्चित फल, चिकित्सकीय आश्वासन अथवा किसी अनिवार्य परिणाम के दावे के रूप में न समझें।
आरतियों के पाठांतर और क्षेत्रीय परंपराएँ
गणेश आरतियाँ लोकभक्ति, मंदिर और गृह-पूजा परंपराओं में जीवित पाठ हैं। इसलिए एक ही आरती के शब्द, उच्चारण, टेक अथवा पदों का क्रम क्षेत्रानुसार बदल सकता है। अपने घर अथवा मंदिर में प्रचलित सम्मानित पाठ को अपनाना उचित है।
आरती के बाद संक्षिप्त प्रार्थना
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
आरती के पश्चात श्री गणेशजी को प्रणाम कर प्रसाद ग्रहण किया जा सकता है।
आरती से भिन्न मंत्र, स्तोत्र और अथर्वशीर्ष
गणपति अथर्वशीर्ष संस्कृत धार्मिक पाठ है, आरती नहीं। विस्तृत स्तुति-पाठ के इच्छुक पाठक गणपति सहस्रनाम भी देख सकते हैं।
क्रमबद्ध पूजन-संदर्भ के लिए श्री गणेश पूजन-विधि उपलब्ध है। उस पुराने पृष्ठ में यदि वर्ष, तिथि या मुहूर्त दिया हो, तो उसे अपने नगर के वर्तमान पंचांग और स्थानीय परंपरा से अवश्य मिला लें।
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