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25 Ekaadashi Vrat = Nirjala Ekadashi (निर्जला एकादशी)


Nirjala Ekadashi : Thu, 16 June 2016

निर्जला एकादशी का व्रत आयु, आरोग्यवृद्धि एवं पुण्य लाभ की दृष्टि से विशेष माना गया है।

व्यासजी के अनुसार अगर एक वर्ष की पच्चीस एकादशी न की जा सके तो केवल निर्जला एकादशी का व्रत करने से ही पुण्य लाभ हो जाता है।

Without drinking even water, one should fast on the Ekadasi that occurs during the light fortnight of the month of Jyeshtha (May-June) when the sun travels in the sign of Taurus (Vrishabh) and Gemini (Mithun), According to learned personalities, on this day one may bathe and perform Achamana for pratiprokshana purification. But while performing Achamana one may drink only that amount of water equal to a drop of gold, or that amount it takes to immerse a single mustard seed. Only this amount of water should be placed in the right palm for sipping, which one should form to resemble a cow's ear. If one drinks more water than this, he might as well have drunk wine - despite the soaring heat of summer (in the northern hemisphere and cold in the southern hemisphere).

Pray to the Supreme Personality of Godhead, Lord Sri Krishna in this way making your sankalpa declaration, `Oh Lord of all the devas (demigods), Oh Supreme Personality of Godhead, today I shall observe Ekadashi without taking any water. Oh unlimited Anantadev, I shall break fast on the next day, Dwadashi.' Thereafter, to remove all his sins, the devotee should honour this Ekadashi fast with full faith in the Lord and with full control over his senses. Whether his sins are equal in volume to Mount Sumeru or to MandarAchala Hill, if he or she observes this Ekadashi, the sins that have been accumulated all become nullified and are burned to ashes. Such is the great power of this Ekadashi.

One must certainly not eat anything, for if he does so he breaks his fast. This rigid fast is in effect from sunrise on the Ekadashi day to sunrise on the Dwadashi day. If a person endeavours to observe this great fast very strictly, he easily achieves the result of observing all twenty-five other Ekadashi fasts throughout the entire year.

On Dwadashi the devotee should bathe early in the morning. Then, according to the prescribed rules, guidelines and regulative injunctions, and of course depending on his ability, he should give some gold and water to worthy brahmanas. Finally, he should cheerfully honour prasadam with a brahmana.

Although a person should also give water and cows in charity during this Ekadashi, if for some reason or other he cannot, then he should give a qualified brahman some cloth or a pot filled with water. Indeed, the merit achieved by giving water alone equals that gained by giving gold ten million times a day.

One who on this day gives a brahmana a waterpot, an umbrella, or shoes surely goes to the heavenly planets. Indeed, he who simply hears these glories also attains to the transcendental abode of the Supreme Lord, Shri Vishnu. Whoever performs the Shraddha ceremony to the forefathers on the dark-moon day called amavasya, particularly if it occurs at the time of a solar eclipse undoubtedly achieves great merit. But this same merit is achieved by him who simply hears this sacred narration - so powerful and so dear to the Lord is this Ekadashi.

Anyone who does not fast on this particular Ekadashi (Nirajala Ekadashi), they should be understood to be sinful, corrupted and suicidal person without a doubt.

Remember, whosoever eats any grains on Ekadashi becomes contaminated by sin and verily eats only sin. In effect, he has already become a dog-eater, and after death he suffers a hellish existence. But he who observes this sacred Jyeshtha-shukla Ekadashi and gives something in charity certainly achieves liberation from the cycle of repeated birth and death and attains to the supreme abode. Observing this Ekadashi, which is merged with Dwadashi, frees one from the horrible sin of killing a brahmana, drinking liquor and wine, becoming envious of one's spiritual master and ignoring his instructions, and continually telling lies.


- Vyasadeva speaks to Bhimasena

(from Brahma-Vaivarta Purana & Padma Purana)

निर्जला एकादशी व्रत कथा

युधिष्ठिर ने कहा : जनार्दन ! ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी पड़ती हो, कृपया उसका वर्णन कीजिये ।

भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! इसका वर्णन परम धर्मात्मा सत्यवतीनन्दन व्यासजी करेंगे, क्योंकि ये सम्पूर्ण शास्त्रों के तत्त्वज्ञ और वेद वेदांगों के पारंगत विद्वान हैं ।

तब वेदव्यासजी कहने लगे : दोनों ही पक्षों की एकादशियों के दिन भोजन न करे । द्वादशी के दिन स्नान आदि से पवित्र हो फूलों से भगवान केशव की पूजा करे । फिर नित्य कर्म समाप्त होने के पश्चात् पहले ब्राह्मणों को भोजन देकर अन्त में स्वयं भोजन करे । राजन् ! जननाशौच और मरणाशौच में भी एकादशी को भोजन नहीं करना चाहिए ।

यह सुनकर भीमसेन बोले : परम बुद्धिमान पितामह ! मेरी उत्तम बात सुनिये । राजा युधिष्ठिर, माता कुन्ती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव ये एकादशी को कभी भोजन नहीं करते तथा मुझसे भी हमेशा यही कहते हैं कि : ‘भीमसेन ! तुम भी एकादशी को न खाया करो…’ किन्तु मैं उन लोगों से यही कहता हूँ कि मुझसे भूख नहीं सही जायेगी ।

भीमसेन की बात सुनकर व्यासजी ने कहा : यदि तुम्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति अभीष्ट है और नरक को दूषित समझते हो तो दोनों पक्षों की एकादशीयों के दिन भोजन न करना ।

भीमसेन बोले : महाबुद्धिमान पितामह ! मैं आपके सामने सच्ची बात कहता हूँ । एक बार भोजन करके भी मुझसे व्रत नहीं किया जा सकता, फिर उपवास करके तो मैं रह ही कैसे सकता हूँ? मेरे उदर में वृक नामक अग्नि सदा प्रज्वलित रहती है, अत: जब मैं बहुत अधिक खाता हूँ, तभी यह शांत होती है । इसलिए महामुने ! मैं वर्षभर में केवल एक ही उपवास कर सकता हूँ । जिससे स्वर्ग की प्राप्ति सुलभ हो तथा जिसके करने से मैं कल्याण का भागी हो सकूँ, ऐसा कोई एक व्रत निश्चय करके बताइये । मैं उसका यथोचित रुप से पालन करुँगा ।

व्यासजी ने कहा : भीम ! ज्येष्ठ मास में सूर्य वृष राशि पर हो या मिथुन राशि पर, शुक्लपक्ष में जो एकादशी हो, उसका यत्नपूर्वक निर्जल व्रत करो । केवल कुल्ला या आचमन करने के लिए मुख में जल डाल सकते हो, उसको छोड़कर किसी प्रकार का जल विद्वान पुरुष मुख में न डाले, अन्यथा व्रत भंग हो जाता है । एकादशी को सूर्यौदय से लेकर दूसरे दिन के सूर्यौदय तक मनुष्य जल का त्याग करे तो यह व्रत पूर्ण होता है । तदनन्तर द्वादशी को प्रभातकाल में स्नान करके ब्राह्मणों को विधिपूर्वक जल और सुवर्ण का दान करे । इस प्रकार सब कार्य पूरा करके जितेन्द्रिय पुरुष ब्राह्मणों के साथ भोजन करे । वर्षभर में जितनी एकादशीयाँ होती हैं, उन सबका फल निर्जला एकादशी के सेवन से मनुष्य प्राप्त कर लेता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है । शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान केशव ने मुझसे कहा था कि: ‘यदि मानव सबको छोड़कर एकमात्र मेरी शरण में आ जाय और एकादशी को निराहार रहे तो वह सब पापों से छूट जाता है ।’

एकादशी व्रत करनेवाले पुरुष के पास विशालकाय, विकराल आकृति और काले रंगवाले दण्ड पाशधारी भयंकर यमदूत नहीं जाते । अंतकाल में पीताम्बरधारी, सौम्य स्वभाववाले, हाथ में सुदर्शन धारण करनेवाले और मन के समान वेगशाली विष्णुदूत आखिर इस वैष्णव पुरुष को भगवान विष्णु के धाम में ले जाते हैं । अत: निर्जला एकादशी को पूर्ण यत्न करके उपवास और श्रीहरि का पूजन करो । स्त्री हो या पुरुष, यदि उसने मेरु पर्वत के बराबर भी महान पाप किया हो तो वह सब इस एकादशी व्रत के प्रभाव से भस्म हो जाता है । जो मनुष्य उस दिन जल के नियम का पालन करता है, वह पुण्य का भागी होता है । उसे एक एक प्रहर में कोटि कोटि स्वर्णमुद्रा दान करने का फल प्राप्त होता सुना गया है । मनुष्य निर्जला एकादशी के दिन स्नान, दान, जप, होम आदि जो कुछ भी करता है, वह सब अक्षय होता है, यह भगवान श्रीकृष्ण का कथन है । निर्जला एकादशी को विधिपूर्वक उत्तम रीति से उपवास करके मानव वैष्णवपद को प्राप्त कर लेता है । जो मनुष्य एकादशी के दिन अन्न खाता है, वह पाप का भोजन करता है । इस लोक में वह चाण्डाल के समान है और मरने पर दुर्गति को प्राप्त होता है ।

जो ज्येष्ठ के शुक्लपक्ष में एकादशी को उपवास करके दान करेंगे, वे परम पद को प्राप्त होंगे । जिन्होंने एकादशी को उपवास किया है, वे ब्रह्महत्यारे, शराबी, चोर तथा गुरुद्रोही होने पर भी सब पातकों से मुक्त हो जाते हैं ।

कुन्तीनन्दन ! ‘निर्जला एकादशी’ के दिन श्रद्धालु स्त्री पुरुषों के लिए जो विशेष दान और कर्त्तव्य विहित हैं, उन्हें सुनो: उस दिन जल में शयन करनेवाले भगवान विष्णु का पूजन और जलमयी धेनु का दान करना चाहिए अथवा प्रत्यक्ष धेनु या घृतमयी धेनु का दान उचित है । पर्याप्त दक्षिणा और भाँति भाँति के मिष्ठान्नों द्वारा यत्नपूर्वक ब्राह्मणों को सन्तुष्ट करना चाहिए । ऐसा करने से ब्राह्मण अवश्य संतुष्ट होते हैं और उनके संतुष्ट होने पर श्रीहरि मोक्ष प्रदान करते हैं । जिन्होंने शम, दम, और दान में प्रवृत हो श्रीहरि की पूजा और रात्रि में जागरण करते हुए इस ‘निर्जला एकादशी’ का व्रत किया है, उन्होंने अपने साथ ही बीती हुई सौ पीढ़ियों को और आनेवाली सौ पीढ़ियों को भगवान वासुदेव के परम धाम में पहुँचा दिया है । निर्जला एकादशी के दिन अन्न, वस्त्र, गौ, जल, शैय्या, सुन्दर आसन, कमण्डलु तथा छाता दान करने चाहिए । जो श्रेष्ठ तथा सुपात्र ब्राह्मण को जूता दान करता है, वह सोने के विमान पर बैठकर स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है । जो इस एकादशी की महिमा को भक्तिपूर्वक सुनता अथवा उसका वर्णन करता है, वह स्वर्गलोक में जाता है । चतुर्दशीयुक्त अमावस्या को सूर्यग्रहण के समय श्राद्ध करके मनुष्य जिस फल को प्राप्त करता है, वही फल इसके श्रवण से भी प्राप्त होता है । पहले दन्तधावन करके यह नियम लेना चाहिए कि : ‘मैं भगवान केशव की प्रसन्न्ता के लिए एकादशी को निराहार रहकर आचमन के सिवा दूसरे जल का भी त्याग करुँगा ।’ द्वादशी को देवेश्वर भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए । गन्ध, धूप, पुष्प और सुन्दर वस्त्र से विधिपूर्वक पूजन करके जल के घड़े के दान का संकल्प करते हुए निम्नांकित मंत्र का उच्चारण करे :
देवदेव ह्रषीकेश संसारार्णवतारक । 

उदकुम्भप्रदानेन नय मां परमां गतिम्॥

‘संसारसागर से तारनेवाले हे देवदेव ह्रषीकेश ! इस जल के घड़े का दान करने से आप मुझे परम गति की प्राप्ति कराइये ।’

भीमसेन ! ज्येष्ठ मास में शुक्लपक्ष की जो शुभ एकादशी होती है, उसका निर्जल व्रत करना चाहिए । उस दिन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को शक्कर के साथ जल के घड़े दान करने चाहिए । ऐसा करने से मनुष्य भगवान विष्णु के समीप पहुँचकर आनन्द का अनुभव करता है । तत्पश्चात् द्वादशी को ब्राह्मण भोजन कराने के बाद स्वयं भोजन करे । जो इस प्रकार पूर्ण रुप से पापनाशिनी एकादशी का व्रत करता है, वह सब पापों से मुक्त हो आनंदमय पद को प्राप्त होता है ।

यह सुनकर भीमसेन ने भी इस शुभ एकादशी का व्रत आरम्भ कर दिया । तबसे यह लोक मे ‘पाण्डव द्वादशी’ के नाम से विख्यात हुई । इस व्रत को भीमसेनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है ।

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Jai Ambe Gauri - Durga Aarti (English & Hindi)

Durgaji Ki Aarti - Jai Ambe Gauri

Jai ambe gauri maiya jai shyama gauri
Tumako nishadin dhyawat hari bramha shivaji || Maiya Jai..||

Mang sindur virajat tiko mrigamad ko
Ujjwal se dou naina chandrawadan niko || Maiya..

Kanak saman kalevar raktambar raje
Rakt pushp gal mala kanthan par saje || Maiya..

Kehari wahan rajat khadag khappar dhari
Sur-nar-munijan sewat tinake dukhahari || Maiya..

Kaanan kundal shobhit nasagre moti
Kotik chandr diwakar rajat sam jyoti || Maiya..

Shumbh-nishumbh bidare mahishasur ghati
Dhumr vilochan naina nishadin madamati || Maiya..

Chand-mund sanhare shonit bij hare
Madhu-kaitabh dou mare sur bhayahin kare || Maiya..

Bramhani rudranitum kamala rani
Agam nigam bakhanitum shiv patarani || Maiya..

Chausath yogini mangal gawatnritya karat bhairu
Bajat tal mridangaaru baajat damaru || Maiya..

Tum hi jag ki mata tum hi ho bharata
Bhaktan ki dukh harta sukh sampati karta || Maiya..

Bhuja char ati shobhivaramudra dhari
Manwanchhit fal pawat sewat nar nari || Maiya..

Kanchan thal virajat a…

Pitra Tarpan Mantras – Offer Water to Departed Soul

TARPAN MANTRAS Awahan: First invite (call) your ancestor’s spirit by praying (fold your hand) through this mantra: “Om Aagachchantu Me Pitar Emam Grihanantu Jalaanjalim.” Tarpan (offer Water)
Now offer Teel Mixed Water or Ganga Jal : 3 times for each one

For Father “AmukGotrah AsmatPita AmukSharma Vasuroopastripyatamidam Teelodakam (GangaJalam Vaa) Tasmey Swadha Namah, Tasmey Swadha Namah, Tasmey Swadha Namah.” Replace AmukGotrah with : Family Gotra AsmatPita: Use for father AmukSharma: Father’s Name Teelodakam: Use if Teel is mixed with water otherwise use “GangaJalam Vaa” Tasmey Swadha Namah 3 times while leaving (offering) water from hand

To Grand Father Replace AsmatPita with Asmatpitamah Replace Vasuroopastripyatamidam with Rudraroopastripyatamidam Replace AmukSharma with Grand Father’s Name

Durga Puja Samagri (Items) - Checklist

Durga Puja Samagri List

1. Deity (statue/photo), Chunari, Shringaar items 
2. Two big lamps (with wicks, oil/ghee), 
3. Matchbox, Agarbatti 
4. Karpoor, Gandha Powder, Kumkum, gopichandan, haldi 
5. Sri Mudra (for Sandhyaavandan), Vessel for Tirtha, Yajnopavita , Roli, Moli(Kaleva)
6. Puja Conchshell, Bell, One aarati (for Karpoor), Two Aaratis with wicks
7. Flowers, Akshata (in a container), tulsi leaves
8. Decorated Copper or Silver or other Kalasha, Two pieces of red cloth (new),
9. Coconut, 1/2 kg. Rice, Bananas 6, gold coin, gold chain
10. Extra Kalasha, 3 trays, 3 vessels for Abhisheka 
11. Beetlenuts 6, Beetlenut Leaves 12, Banana Leaves 2, Mango Leaves 5-25
12. Dry Fruits, 5 bananas, 1 coconut - all for naivedya
13. Panchaamrita - Milk, Curd, Honey, Ghee, Sugar, Ganga Jal 
14. Puja Book,containing Aarti, Stotra, Chalisa, Stuti etc. 
15. Red flowers and red flower malas.
16. Also fruits and prasad as far as possible 21 varieties.
For more details consult your priest/purohit.

How to perform Durga Puja (Step-wise): Mantras, Prarthana, Aarti

Step-wise direction to perform Durga Puja First perform Kalash Puja or Ghatsthapana Now perform ‘Atma Puja’ for self-purification. This is done by the chanting of the following mantras: OM APAVITRAH PAVITRO VA SARVAVASTHAM GATOAPI VA, YAH SMRAIT PUNDARIKA AKSHAM SA VAHY ABHYANTARAH SHUCHIH. Explanation: Whoever contemplates upon Vishnu gets automatically purified, both mentally and physically. Tilak : Apply Tilak (an auspicious mark) on your forehead This is followed by ‘Achman’ (drinking of holy water after accepting it in the palm of the hand), which helps to wash off the sins committed by action, thought and speech. The mantra runs as follows: OM KESHAVAYA NAMAH, OM NARAYANAYA NAMAH, OM MADHAVAYA NAMAH, OM GOVINDAYA NAMAH. Explanation: I bow to thee Keshav, I bow to thee Narayan, I bow to thee Madhav, I bow to thee Govind. SANKALPA : To make a firm resolve (Sankalpa) to achieve the purpose of the ceremony. It is customary to take a little water in one’s hand and make resolve. AAWAHAN (Pra…

Ghatasthapana (Kalash Sthapana) Day & Time : Thu, 21 September 2017

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Ghat Sthapan Muhurat - 06:15 to 08:05 AM 
अभिजीत मुहूर्त और लाभ चौघड़िया में भी आप बिना किसी विचार के घटस्थापन कर सकते हैं ।

* Delhi, India Local Time (IST)
- Pratipada Tithi Until 10:34 AM of 21st Sep 2017


The first day of Navratra is called Ghatasthapana, which literally means pot establishing. On this day the kalash, (holy water vessel) symbolising Goddess Durga often with her image embossed on the side is placed in the prayer room. The kalash is filled with holy water and covered with cowdung on to which seeds are sown. A small rectangular sand block is made and the kalash is put in the centre. The surrounding bed of sand is also seeded with grains.


The Ghatasthapana ritual is performed at a certain auspicious moment determined by the pundits. At that particular moment the priest intones a welcome, requesting goddess Durga to bless the vessel with Her presence. At several places there is a tradition of sowing bar…