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Ghatsthapana - Chaitra Navratri 2017: Tuesday, 28 March

 Pratipada Tithi Start : 08.27 AM , 28 March 2017
Pratipada Tithi Ends : 05.45 AM, 29 March 2017

Ghatsthapana Muhurat : 08.27 AM to 10.24 AM

वर्ष के चार नवरात्रों में दो मुख्य चैत्र और आश्विन के नवरात्र हैं। इनमें भी चैत्र नवरात्र की अपनी विशिष्टता और महत्ता है। इसकी विशिष्टता का कारण इस अवधि में सूक्ष्म वातावरण में दिव्य हलचलों का होना है।

ये चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघकी शुक्ल प्रतिपदासे नवमीतक नौ दिनके होते हैं; परंतु प्रसिद्धिमें चैत्र और आश्विनके नवरात्र ही मुख्य माने जाते हैं । इनमें भी देवीभक्त आश्विनके नवरात्र आधिक करते हैं । इनको यथाक्रम वासन्ती और शारदीय कहते हैं । इनका आरम्भ चैत्र और आश्विन शुक्ल प्रतिपदाको होता है । अतः यह प्रतिपदा ’ सम्मुखी ’ शुभ होती है ।

नवरात्रोंके आरम्भमें अमायुक्त प्रतिपदा अच्छी नहीं । आरम्भमें घटस्थापनके समय यदि चित्रा और वैधूति हो तो उनका त्याग कर देना चाहिये; क्योंकि चित्रामें धनका और वैधृतिमें पुत्रका नाश होता है ।  घटस्थापनका समय ’ प्रातःकाल ’ है । अतः उस दिन चित्रा या वैधृति रात्रितक रहें ( और रात्रिमें नवरात्रोंका स्थापन या आरम्भ होता नहीं, ) तो या तो वैधृत्यादिके आद्य तीन अंश त्यागकर चौथे अंशमें करे या मध्याह्लके समय ( अभिजित मुहूर्तमें ) स्थापन करे । स्मरण रहे कि देवीका आवाहन, प्रवेशन, नित्यार्चन और विसर्जन - ये सब प्रातःकालमें शुभ होते हैं । यदि नवरात्रोंमें घटस्थापन करनेके बाद सूतक हो जाय तो को‌ई दोष नहीं, परंतु पहले हो जाय तो पूजनादि स्वयं न करे ।

नवरात्रका प्रयोग प्रारम्भ करनेके पहले सुगन्धयुक्त तैलके उद्वर्तनादिसे मङ्गलस्त्रान करके नित्यकर्म करे और स्थिर शान्तिके पवित्र स्थानमें शुभ मृत्तिकाकी वेदी बनाये । उसमें जौ और गेहूँ - इन दोनोंको मिलाकर बोये । वहीं सोने, चाँदी, ताँबे या मिट्टीके कलशको यथाविधि स्थापन करके गणेशादिका पूजन और पुण्याहवाचन करे और पीछे देवी ( या देव ) के समीप शुभासनपर पूर्व ( या उत्तर ) मुख बैठकर

"मम महामायाभगवती ( वा मायाधिपति भगवत ) प्रीतये ( आयुर्बलवित्तारोयसमादरादिप्राप्तये वा ) नवरात्रव्रतमहं करिष्ये ।"

यह संकल्प करके मण्डलके मध्यमें रखे हु‌ए कलशपर सोने, चाँदी, धातु, पाषाण, मृत्तिका या चित्रमय मूर्ति विराजमान करे और उसका आवाहन आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्त्रान, वस्त्र, गन्ध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, आचमन, ताम्बूल, नीराजन, पुष्पाञ्जलि, नमस्कार और प्रार्थना आदि उपचारोंसे पूजन करे ।

स्त्री हो या पुरुष, सबको नवरात्र करना चाहिये । यदि कारणवश स्वयं न कर सकें तो प्रतिनिधि ( पति - पत्नी, ज्येष्ठ पुत्र, सहोदर या ब्राह्मण ) द्वारा करायें ।  नवरात्र नौ रात्रि पूर्ण होनेसे पूर्ण होता है । इसलिये यदि इतना समय न मिले या सामर्थ्य न हो तो सात, पाँच, तीन या एक दिन व्रत करे और व्रतमें भी उपवास, अयाचित, नक्त या एकभुक्त - जो बन सके यथासामर्थ्य वही कर ले ।
यदि सामर्थ्य हो तो नौ दिनतक नौ ( और यदि सामर्थ्य न हो तो सात, पाँच, तीन या एक ) कन्या‌ओंको देवी मानका उनको गन्ध - पुष्पादिसे अर्चित करके भोजन कराये और फिर आप भोजन करे । व्रतीको चाहिये कि उन दिनोंमें भुशयन, मिताहार, ब्रह्मचर्यका पालन, क्षमा, दया, उदारता एवं उत्साहदिकी वृद्धि और क्रोध, लोभ, मोहादिका त्याग रखे ।

चैत्रके नवरात्रमें शक्तिकी उपासना तो प्रसिद्ध ही हैं, साथ ही शक्तिधरकी उपासना भी की जाती है । उदाहरणार्थ एक ओर देवीभागवत कालिकापुराण, मार्कण्डेयपुराण, नवार्णमन्त्नके पुरश्चरण और दुर्गापाठकी शतसहस्त्रायुतचण्डी आदि होते हैं तो दूसरी ओर श्रीमद्भागवत, अध्यात्मरामायण, वाल्मीकीय रामायण, तुलसीकृत रामायण, राममन्त्न - पुरश्चरण एक - तीन - पाँच - सात दिनकी या नवाह्लिक अखण्ड रामनामधव्नि और रामलीला आदि किये जाते हैं । यही कारण है कि ये ’ देवी - नवरात्र ’ और ’ राम - नवरात्र ’ नामोंसे प्रसिद्ध हैं ।

इस प्रकार नौ रात्रि व्यतीत होनेपर दसवें दिन प्रातःकालमें विसर्जन करे तो सब प्रकारके विपुल सुख - साधन सदैव प्रस्तुत रहते हैं और भगवान ( या भगवती ) प्रसन्न होते हैं ।


Jai Mata Di

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