नवरात्रि का पर्व भारतीय संस्कृति में आदिशक्ति माँ दुर्गा को समर्पित एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण त्योहार है। यह नौ दिनों का उत्सव आत्म-शुद्धि, तपस्या और देवी की उपासना का प्रतीक है। इन नौ दिनों में भक्तगण माँ के विभिन्न स्वरूपों की आराधना करते हैं और विशेष रूप से उपवास रखते हैं। उपवास केवल भोजन त्याग तक सीमित नहीं, बल्कि यह मन, वचन और कर्म से शुद्धता का एक मार्ग है। धर्म शास्त्रों में नवरात्रि व्रत के नियमों का विस्तृत वर्णन मिलता है, जिनका पालन करके ही भक्तजन इस व्रत का पूर्ण फल प्राप्त कर सकते हैं। यह व्रत न केवल शारीरिक शुद्धि प्रदान करता है, बल्कि आध्यात्मिक उत्थान और मानसिक शांति का भी स्रोत है। सही नियमों का ज्ञान और उनका निष्ठापूर्वक पालन ही इस पवित्र अनुष्ठान को सफल बनाता है। इन नौ दिनों में, व्यक्ति अपनी इंद्रियों को नियंत्रित कर एक उच्चतर चेतना की ओर अग्रसर होता है, जिससे उसे देवी माँ का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। व्रत का मूल उद्देश्य आत्म-नियंत्रण और ईश्वर के प्रति अटूट श्रद्धा को बढ़ाना है।

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धर्म शास्त्रों के अनुसार, नवरात्रि के व्रत में कुछ विशेष खाद्य पदार्थ ही ग्रहण किए जाते हैं, जिन्हें 'फलाहार' की श्रेणी में रखा जाता है। इन खाद्य पदार्थों का चुनाव इस प्रकार किया गया है ताकि शरीर को आवश्यक ऊर्जा मिले, लेकिन मन को सात्विक और शांत बनाए रखा जा सके। मुख्य रूप से, कुट्टू का आटा (बकवीट), सिंघाड़े का आटा (वॉटर चेस्टनट), साबूदाना, समा के चावल (बार्नयार्ड बाजरा) और राजगीरा (अमरंथ) का सेवन किया जाता है। इनसे बनी पूड़ियाँ, रोटियाँ या खिचड़ी लोकप्रिय हैं। सब्जियों में आलू, अरबी, शकरकंद, लौकी, कद्दू, टमाटर, पालक और खीरा आदि का उपयोग किया जा सकता है। दालें और अनाज जैसे गेहूं, चावल, मक्का आदि पूर्ण रूप से वर्जित होते हैं। फलों में सभी प्रकार के मौसमी फल जैसे सेब, केला, अंगूर, पपीता, अनार, तरबूज और खरबूजा आदि का भरपूर सेवन किया जा सकता है। दूध और दूध से बने उत्पाद जैसे दही, पनीर, छाछ और घी का भी सेवन किया जाता है। सेंधा नमक का उपयोग सामान्य नमक के स्थान पर किया जाता है। व्रत के दौरान पर्याप्त मात्रा में पानी और फलों का रस पीना भी आवश्यक है ताकि शरीर में पानी की कमी न हो।

नवरात्रि के व्रत में क्या नहीं खाना चाहिए, यह जानना भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना यह जानना कि क्या खाना चाहिए। धर्म शास्त्रों में स्पष्ट रूप से कुछ खाद्य पदार्थों के सेवन को वर्जित किया गया है ताकि व्रत की पवित्रता और उसके आध्यात्मिक उद्देश्यों को बनाए रखा जा सके। सबसे पहले, सामान्य अनाज और दालें जैसे गेहूं, चावल, बेसन, सूजी, दालें (अरहर, मूंग, मसूर, चना आदि) और सभी प्रकार की फलियाँ (राजमा, छोले आदि) पूरी तरह से त्याज्य हैं। इसके अलावा, मांसाहारी भोजन, अंडे, प्याज और लहसुन का सेवन भी बिल्कुल नहीं करना चाहिए, क्योंकि इन्हें तामसिक प्रवृत्ति का माना जाता है और ये मन को विचलित कर सकते हैं। शराब, तंबाकू और किसी भी प्रकार के नशे से दूर रहना अनिवार्य है। सामान्य नमक (साधारण नमक) का प्रयोग वर्जित है, इसकी जगह सेंधा नमक का उपयोग किया जाता है। तेल में, सरसों का तेल और रिफाइंड तेल का उपयोग नहीं किया जाता; इसके बजाय घी या मूंगफली के तेल का उपयोग किया जाता है। चटपटा, मसालेदार और बासी भोजन भी व्रत के दौरान नहीं खाना चाहिए।

व्रत की सफलता केवल खाने-पीने के नियमों का पालन करने तक सीमित नहीं है, बल्कि धर्म शास्त्रों के अनुसार इसमें मन, वचन और कर्म की शुद्धता भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। व्रत को सफल बनाने के लिए कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिए। सबसे पहले, नियमित रूप से माँ दुर्गा की पूजा-अर्चना और आरती करनी चाहिए। सुबह और शाम दोनों समय देवी का ध्यान करें और मंत्रों का जाप करें। ब्रह्मचर्य का पालन करना अनिवार्य है, जिसका अर्थ है शारीरिक और मानसिक शुचिता बनाए रखना। क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार और ईर्ष्या जैसी नकारात्मक भावनाओं से दूर रहना चाहिए। किसी की निंदा न करें और न ही किसी के प्रति दुर्भावना रखें। सत्य बोलना और मधुर वाणी का प्रयोग करना भी व्रत का एक महत्वपूर्ण अंग है। व्रतधारी को सादगीपूर्ण जीवन शैली अपनानी चाहिए, जिसमें जमीन पर सोना और साधारण वस्त्र पहनना शामिल हो सकता है। दिन में सोना वर्जित है। दान-पुण्य करना और जरूरतमंदों की सहायता करना भी व्रत के पुण्य को बढ़ाता है। इन नियमों का पालन करने से व्यक्ति न केवल शारीरिक शुद्धि प्राप्त करता है, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक रूप से भी सशक्त बनता है, जिससे उसे माँ दुर्गा का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है।

संक्षेप में, नवरात्रि का व्रत सिर्फ अन्न-जल त्यागने का अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह आत्म-नियंत्रण, शुद्धि और देवी भक्ति का एक गहन अनुभव है। धर्म शास्त्रों में वर्णित 'क्या खाएं' और 'क्या न खाएं' के नियम हमारे शरीर और मन को सात्विक बनाए रखने में मदद करते हैं, जिससे हम आध्यात्मिक साधना के लिए बेहतर स्थिति में आते हैं। वहीं, 'कैसे सफल करें' के अंतर्गत बताए गए आचार-विचार और नैतिक नियम हमें आंतरिक शुद्धि की ओर ले जाते हैं। यह पर्व हमें सिखाता है कि वास्तविक शक्ति बाहरी भोग में नहीं, बल्कि आंतरिक संयम और ईश्वरीय प्रेम में निहित है। जब हम इन सभी नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करते हैं, तो हमारा व्रत केवल एक शारीरिक क्रिया नहीं रहता, बल्कि यह एक पूर्ण आध्यात्मिक यात्रा बन जाता है, जो हमें माँ भगवती के समीप ले जाता है। नवरात्रि के इन पवित्र दिनों में सच्चे हृदय से की गई उपासना और नियमों का पालन भक्तों के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाता है। यह व्रत जीवन को सही दिशा देने वाला और परम कल्याणकारी होता है।

Summary

This article delves into the observance of Navratri vrat (fasting) according to Dharma Shastras, providing comprehensive guidance on permissible and prohibited foods, as well as practices to ensure the success of the fast. It explains the spiritual significance of Navratri as a period of self-purification and devotion to Maa Durga. The article details what foods to consume, such as kuttu, singhara, fruits, milk products, and specific vegetables, emphasizing a sattvic diet. Conversely, it lists forbidden items including grains, legumes, non-vegetarian food, onions, garlic, alcohol, and regular salt. Beyond diet, the article outlines scriptural recommendations for a successful vrat, including regular puja, meditation, maintaining celibacy, avoiding negative emotions, speaking truth, and engaging in charity, highlighting the importance of purity in mind, speech, and action. It concludes by stressing that the Navratri vrat is a holistic spiritual journey aimed at inner control and divine connection, bringing peace and prosperity when observed with devotion and adherence to scriptural guidelines.