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Tulsi Vivah Katha, Pujan Vidhi and Aarti

By Govind •

Tulsi Vivah : Tuesday, 31 October 2017

कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की एकादशी को तुलसी विवाह का उत्सव मनाया जाता है। तुलसी के पौधे को पवित्र और पूजनीय माना गया है। तुलसी की नियमित पूजा से हमें सुख-समृद्धि की प्रााुप्त होती है। कार्तिक शुक्ल एकादशी पर तुलसी विवाह का विधिवत पूजन करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

तुलसी विवाह कथा

पुराण की कथा के अनुसार— कालांतर में तुलसी देवी भगवान गणेश के शापवश असुर शंखचूड की पत्नी बनीं। जब असुर शंखचूड का आतंक फैलने लगा तो भगवान श्री हरि ने वैष्णवी माया फैलाकर शंखचूड से कवच ले लिया और उसका वध कर दिया। तत्पश्चात् भगवान श्री हरि शंखचूड का रूप धारण कर साध्वी तुलसी के घर पहुंचे, वहां उन्होंने शंखचूड समान प्रदर्शन किया। तुलसी ने पति को युद्ध में आया देख उत्सव मनाया और उनका सहर्ष स्वागत किया।

उस समय तुलसी के साथ उन्होंने सुचारू रूप से हास-विलास किया तथापि तुलसी को इस बार पहले की अपेक्षा आकर्षण में व्यतिक्रम का अनुभव हुआ। अत: उसे वास्तविकता का अनुमान हो गया। तब तुलसी देवी ने पूछा—मायेश! आप कौन हैं, आपने मेरा सतीत्व नष्ट कर दिया, इसलिए अब मैं आप को शाप दे रही हूं। तुलसी के वचन सुनकर शाप के भय से भगवान श्री हरि ने अपना लीलापूर्वक अपना सुन्दर मनोहर स्वरूप प्रकट किया। उन्हें देखकर पति के निधन का अनुमान करके कामिनी तुलसी मूर्छित हो गई।  फिर चेतना प्राप्त होने पर उसने कहा—नाथ आपका ह्वदय पाषाण के सदृश है, इसलिए आप में तनिक भी दया नहीं है। आज आपने छलपूर्वक धर्म नष्ट करके मेरे स्वामी को मार डाला। अत: देव! मेरे शाप से अब पाषाण रूप होकर आप पृथ्वी पर रहें।

इस प्रकार शोक संतृप्त तुलसी विलाप करने लगी। तब भगवान श्री हरि ने कहा—भद्रे। तुम मेरे लिए बहुत दिनों तक तपस्या कर चुकी हो। अब तुम दिव्य देह धारण कर मेरे साथ सानन्द रहो। मैं तुम्हारे शाप को सत्य करने के लिए में पाषाण (शालिग्राम) बनकर रहूंगा और तुम एक पूजनीय तुलसी के पौधे के रूप में पृथ्वी पर रहोगी।

गण्डकी नदी के तट पर मेरा वास होगा। बिना तुम्हारे मेरी पूजा नहीं हो सकेगी। तुम्हारे पत्रों और मंजरियों में मेरी पूजा होगी। जो भी बिना तुम्हारे मेरी पूजा करेगा वह नरक का भागी होगा। इस प्रकार शालिग्राम जी का उद्भव पृथ्वी पर हुआ। अत: तुलसी-शालिग्राम का विवाह पौराणिक आख्यानों पर आधारित है।

तुलसी विवाह की पूजन विधि

तुलसी विवाह के लिए तुलसी के पौधे का गमले को गेरु आदि से सजाकर उसके चारों ओर ईख (गन्ने) का मंडप बनाकर उसके ऊपर ओढ़नी या सुहाग की प्रतीक चुनरी ओढ़ाते हैं। गमले को साड़ी में लपेटकर तुलसी को चूड़ी पहनाकर उनका शृंगार करते हैं। श्री गणेश सहित सभी देवी-देवताओं का तथा श्री शालिग्रामजी का विधिवत पूजन करें। पूजन के करते समय तुलसी मंत्र "तुलस्यै नम:" अथवा "हरिप्रियार्ये नम:" का जप करें। इसके बाद एक नारियल दक्षिणा के साथ टीका के रूप में रखें। भगवान शालिग्राम की मूर्तिका सिहासन हाथ में लेकर तुलसीजी की सात परिक्रमा कराएं। आरती के पश्चात विवाहोत्सव पूर्ण किया जाता है।
जैसे विवाह में जो सभी रीति-रिवाज होते हैं उसी तरह तुलसी विवाह के सभी कार्य किए जाते हैं। विवाह से संबंधित मंगल गीत भी गाए जाते हैं।

सबके लिए आनंदायिनी होने के कारण तुलसीजी "नंदिनी" भी कहलाती है।

तुलसीनामाष्टक का जप करें

अश्वमेघ यज्ञ से प्राप्त पुण्य कई जन्मों तक फल देने वाला होता है। यही पुण्य तुलसी नामाष्टक के नियमित पाठ से मिलता है। तुलसी नामाष्टक का पाठ पूरे विधि-विधान से किया जाना चाहिए।

तुलसी नामाष्टक :--
वृन्दा वृन्दावनी विश्वपूजिता विश्वपावनी। 
पुष्पसारा नन्दनीच तुलसी कृष्ण जीवनी।।
एतभामांष्टक चैव स्रोतं नामर्थं संयुतम। 
य: पठेत तां च सम्पूज् सौऽश्रमेघ फलंलमेता।।

***
श्री तुलसी जी की आरती 
जय जय तुलसी माता
सब जग की सुख दाता, वर दाता
जय जय तुलसी माता ।।
सब योगों के ऊपर, सब रोगों के ऊपर
रुज से रक्षा करके भव त्राता
जय जय तुलसी माता।।
बटु पुत्री हे श्यामा, सुर बल्ली हे ग्राम्या
विष्णु प्रिये जो तुमको सेवे, सो नर तर जाता
जय जय तुलसी माता ।।
हरि के शीश विराजत, त्रिभुवन से हो वन्दित
पतित जनो की तारिणी विख्याता
जय जय तुलसी माता ।।
लेकर जन्म विजन में, आई दिव्य भवन में
मानवलोक तुम्ही से सुख संपति पाता
जय जय तुलसी माता ।।
हरि को तुम अति प्यारी, श्यामवरण तुम्हारी
प्रेम अजब हैं उनका तुमसे कैसा नाता
जय जय तुलसी माता ।।

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