Kartik Maas Mahatmya, Snan and Vrat

by 10/29/2014 0 comments

Kartik Snan & Vrat
 Wed, 28 October 2015 to Wed, 25 November 2015

कार्तिकमास - महात्म्य, स्नान एवं व्रत

सामान्यरूपसे तुलाराशिपर सूर्यनारायणके आते ही कार्तिकमास का प्रारंभ हो जाता हें |

स्कंद पुराण आदि अनेक धर्म ग्रंथों में कार्तिकमास के स्नान-व्रत की महिमा बताई गई है। कार्तिक में पूरे माह ब्रह्ममुहूर्त में किसी नदी, तालाब, नहर या पोखर में स्नानकर भगवान की पूजा किए जाने का विधान है। धर्म शास्त्रों के अनुसार कलियुग में कार्तिक मास में किए गए व्रत, स्नान व तप को मोक्ष प्राप्ति का बताया गया है। स्कंद पुराण में उल्लेखित श्लोक के अनुसार-


न कार्तिकसमो मासो न कृतेन समं युगम्।

न वेदसदृशं शास्त्रं न तीर्थं गंगा समम्।।

अर्थात कार्तिक के समान दूसरा कोई मास नहीं, सत्ययुग के समान कोई युग नही, वेद के समान कोई शास्त्र नहीं और गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं है।

कार्तिकका महात्म्य पद्मपुराण तथा स्कन्दपुराण में बहुत विस्तारसे उपलब्ध है | कार्तिकमासमें स्त्रिया ब्रह्ममुहुर्तमें स्नानकर राधा-दमोदरकी पूजा करती हें |

धर्म शास्त्रों के अनुसार जो मनुष्य कार्तिक मास में व्रत व तप करता है वह मोक्ष को प्राप्त होता है।


मासानां कार्तिक: श्रेष्ठो देवानां मधुसूदन।

तीर्थं नारायणाख्यं हि त्रितयं दुर्लभं कलौ।।

(स्कंद पुराण, वै. खं. कां. मा. 1/14)

स्कंद पुराण में उल्लेखित इस श्लोक के अनुसार भगवान विष्णु एवं विष्णुतीर्थ के समान ही कार्तिक मास भी श्रेष्ठ और दुर्लभ है।

कलियुगमे कार्तिकमास-व्रतको मोक्षके साधनके रुपमे दर्शया गया हें| पुराणोके मतानुसार इस मासको चारों पुरुषार्थो - धर्म, अर्थ, काम और मोक्षको देनेवाला माना गया है | स्वयं नारायणने ब्रह्माको, ब्रह्माने नारद्को और नारदने महाराज पृथुको कार्तिकमासके सर्वगुणसम्पन्न महात्म्यके सन्दर्भमें बताया है | इस मासमें व्रत करनेवाली स्त्रिया अक्षयनवमीको आवंला-वृक्षके नीचे बैठकर भगवान कार्तिकेयकी कथा सुनती है | तदुपरांत जहाँ ब्राह्मणोंको अन्न-धन दानमे दिए जाते हैं , वहीँ भतुआके अन्दर गुप्तदान भी दिया जाता हे| इसके साथ ही कुंवारों - कुंवारी एवं ब्राह्मणों को आवंला-वृक्षके नीचे विधिवत भोजन कराया जाता है | वैसे तो पुरे कार्तिकमासमें दान देने का विधान है |




कार्तिकमास भर दीपदान करनेकी विधि है | आकाशदीप भी जलाया जाता हे | यह कार्तिकका प्रधान कृत्य है | कार्तिकका दूसरा प्रमुख कृत्य तुलसीवन-पालन है | वैसे तो कार्तिकमें ही नहीं हर मासमें तुलसीका सेवन कल्याणमय कहा गया है , किंतु कार्तिकमें तुलसी-आराधनाकी विशेष महिमा है |

विष्णुसंकीर्तन कार्तिकमासका मुख्य कृत्य है | संकीर्तनसे वाणीको सुधता मिलती हे | कलियुगमे तो इसका और भी अधिक महत्व हे - 'कलौ हरिकिर्तनात |' कथाश्रवणसे पापोका नाश होता है , बुद्धि सदाचारी बनती है | कार्तिकव्रतिको चाहिए कि वो गीता ,श्रीमद्भागवत और श्रीरामचारित्रमानस आदिका श्रवण करे | इसके आलावा कार्तिकव्रतिके लिए गोदान, अन्नदान विष्णुपुजन, सत्य अहिंसा अदि धर्मो का पालन आवश्यक है |

कार्तिकव्रतिको सर्वप्रथम गंगा ,विष्णु ,शिव तथा सूर्यका स्मरण कर जलमें प्रवेश करना चाहिए | तदनंतर नाभिपर्यंत जलमे खड़े होकर विधिपूर्वक स्नान करना चाहिए |

कार्तिकमासमें पितरोंका तर्पण करनेसे पितरोंको अक्षयतृप्तिकी प्राप्ति होती है | तर्पणके पश्च्यात व्रतिको जलसे बहार आकार शुद्ध वस्त्र धारण कर भगवान विष्णुका पूजन करना चाहिये |

कार्तिकव्रतिको लौकी , गाजर , कैथ , बैंगन , आदि तथा बासी अन्न, पराया अन्न , दूषित अन्नका भी भक्षण नहीं करना चाहिये |

कार्तिकव्रत करनेवाले मानव को देखकर यमदूत इस प्रकार पलायन कर जाते हैं , जिस प्रकार सिंहसे पीड़ित हाथी भाग खड़े होते हैं |

इस भूतलपर भुक्ति और मुक्तिप्रदायक जितने भी तीर्थस्थान हैं , वे सभी कार्तिकव्रतीके देहमें निवास करते हैं |

Ajay Govind

Devotee,Author

My profile has nothing great to write but I have blessings of Lord Ganesha, Maa Saraswati, Guru Bhagwan and Lord Sri HariHar.